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Rigveda Mandal 3 / Sukta 4 / Mantra 8

62 Sukta
11 Mantra
3/4/8
Devata- आप्रियः Rishi- गाथिनो विश्वामित्रः Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
आ भार॑ती॒ भार॑तीभिः स॒जोषा॒ इळा॑ दे॒वैर्म॑नु॒ष्ये॑भिर॒ग्निः। सर॑स्वती सारस्व॒तेभि॑र॒र्वाक् ति॒स्रो दे॒वीर्ब॒र्हिरेदं स॑दन्तु॥

आ । भार॑ती । भार॑तीभिः । स॒ऽजोषाः॑ । इळाः॑ । दे॒वैः । म॒नु॒ष्ये॑भिः । अ॒ग्निः । सर॑स्वती । सा॒र॒स्व॒तेभिः॑ । अ॒र्वाक् । ति॒स्रः । दे॒वीः । ब॒र्हिः । आ । इ॒दम् । स॒द॒न्तु॒ ॥

Mantra without Swara
आ भारती भारतीभिः सजोषा इळा देवैर्मनुष्येभिरग्निः। सरस्वती सारस्वतेभिरर्वाक् तिस्रो देवीर्बर्हिरेदं सदन्तु॥

आ। भारती। भारतीभिः। सऽजोषाः। इळाः। देवैः। मनुष्येभिः। अग्निः। सरस्वती। सारस्वतेभिः। अर्वाक्। तिस्रः। देवीः। बर्हिः। आ। इदम्। सदन्तु॥

Ashtak » 2 Adhyay » 8 Varga » 23 Mantra » 3

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Meaning
जो (भारतीभिः) सुन्दर शिक्षित वाणियों के साथ (सजोषाः) एकसी सेवा और प्रीतिवाली (भारती) विद्या और शिक्षा से धारण किई हुई वाणी वा (देवैः) दिव्यगुण और (मनुष्येभिः) विचारशील पुरुषों के साथ समान सेवा और प्रीतिवाली (इळा) पृथिवी और (अग्निः) प्रकाशमान अग्नि वा (सारस्वतेभिः) वाणी में उत्पन्न हुए भावों के साथ (सरस्वती) प्रशंसित विज्ञानयुक्त वाणी (तिस्रः) उक्त तीनों (देवीः) देदीप्यमान (अर्वाक्) नीचे से (इदम्) इस (बर्हिः) अन्तरिक्ष को (आ) अच्छे प्रकार स्थिर होती हैं, उनको सब मनुष्य (आ, सदन्तु) आसादन) करें, उनका आश्रय लें अर्थात् उनमें अच्छे प्रकार स्थित हों ॥८॥
Essence
जिन मनुष्यों की विद्वानों की धारणा के अनुकूल धारणा, प्रशंसा के अनुकूल स्तुति, वाणी के अनुकूल वर्त्ताववाली वाणी वर्त्तमान है, वे अन्तरिक्षस्थ शुभ वाणी को प्राप्त होकर आनन्द को प्राप्त होते हैं ॥८॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है।

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