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Rigveda Mandal 3 / Sukta 4 / Mantra 7

62 Sukta
11 Mantra
3/4/7
Devata- आप्रियः Rishi- गाथिनो विश्वामित्रः Chhanda- स्वराट्पङ्क्ति Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
दैव्या॒ होता॑रा प्रथ॒मा न्यृ॑ञ्जे स॒प्त पृ॒क्षासः॑ स्व॒धया॑ मदन्ति। ऋ॒तं शंस॑न्त ऋ॒तमित्त आ॑हु॒रनु॑ व्र॒तं व्र॑त॒पा दीध्या॑नाः॥

दैव्या॑ । होता॑रा । प्र॒थ॒मा । नि । ऋ॒ञ्जे॒ । स॒प्त । पृ॒क्षासः॑ । स्व॒धया॑ । म॒द॒न्ति॒ । ऋ॒तम् । शंस॑न्तः । ऋ॒तम् । इत् । ते । आ॒हुः॒ । अनु॑ । व्र॒तम् । व्र॒त॒ऽपाः । दीध्या॑नाः ॥

Mantra without Swara
दैव्या होतारा प्रथमा न्यृञ्जे सप्त पृक्षासः स्वधया मदन्ति। ऋतं शंसन्त ऋतमित्त आहुरनु व्रतं व्रतपा दीध्यानाः॥

दैव्या। होतारा। प्रथमा। नि। ऋञ्जे। सप्त। पृक्षासः। स्वधया। मदन्ति। ऋतम्। शंसन्तः। ऋतम्। इत्। ते। आहुः। अनु। व्रतम्। व्रतऽपाः। दीध्यानाः॥

Ashtak » 2 Adhyay » 8 Varga » 23 Mantra » 2

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1 Bhashyas
Meaning
जो (प्रथमा) विस्तार करनेवाले (दैव्या) दिव्य गुणी (होतारा) अनेक पदार्थों के ग्रहणकर्ता (सप्त) सात प्रकार के होमने योग्य पदार्थों को अच्छे प्रकार धारण करते हैं वा जो (ऋतम्) जल का (पृक्षासः) संबन्ध करनेवाले (ऋतम्) सत्य की (इत्) ही (शंसन्तः) स्तुति करते हुए (दीध्यानाः) देदीप्यमान (व्रतपाः) उत्तम शील की रक्षा करनेवाले (अनु, व्रतम्) अनुकूल शील को (आहुः) कहें (ते) वे (स्वधया) अन्न और जल से (मदन्ति) हर्षित होते हैं, इन सबको मैं (नि, ऋञ्जे) न नष्ट करूँ ॥७॥
Essence
जो यज्ञ की आहुतियों से शुद्ध पवन, जल और अन्नादिकों का सेवन करते हैं, वे सुशील होते हुए प्रशंसावाले होकर आनन्द को प्राप्त होते हैं ॥७॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है।