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Rigveda Mandal 3 / Sukta 4 / Mantra 10

62 Sukta
11 Mantra
3/4/10
Devata- आप्रियः Rishi- गाथिनो विश्वामित्रः Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
वन॑स्प॒तेऽव॑ सृ॒जोप॑ दे॒वान॒ग्निर्ह॒विः श॑मि॒ता सू॑दयाति। सेदु॒ होता॑ स॒त्यत॑रो यजाति॒ यथा॑ दे॒वानां॒ जनि॑मानि॒ वेद॑॥

वन॑स्पते । अव॑ । सृ॒ज॒ । उप॑ । दे॒वान् । अ॒ग्निः । ह॒विः । श॒मि॒ता । सू॒द॒या॒ति॒ । सः । इत् । ऊँ॒ इति॑ । होता॑ । स॒त्यऽत॑रः । य॒जा॒ति॒ । यथा॑ । दे॒वाना॑म् । जनि॑मानि । वेद॑ ॥

Mantra without Swara
वनस्पतेऽव सृजोप देवानग्निर्हविः शमिता सूदयाति। सेदु होता सत्यतरो यजाति यथा देवानां जनिमानि वेद॥

वनस्पते। अव। सृज। उप। देवान्। अग्निः। हविः। शमिता। सूदयाति। सः। इत्। ऊँ इति। होता। सत्यऽतरः। यजाति। यथा। देवानाम्। जनिमानि। वेद॥

Ashtak » 2 Adhyay » 8 Varga » 23 Mantra » 5

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1 Bhashyas
Meaning
हे (वनस्पते) किरणों के पालनेवाले ! (यथा) जैसे (अग्निः) अग्नि (हविः) होमने योग्य पदार्थ को (सूदयाति) वर्षाता है वैसे (देवान्) दिव्य गुणों को (उप, सृज) अपने समीप उत्पन्न कराओ, दोषों को (अव) न उत्पन्न करो जो (सत्यतरः) अतीव सत्य (होता) गुणों का ग्रहण करनेवाला जैसे (देवानाम्) विद्वानों वा दिव्य पदार्थों के (जनिमानि) जन्मों को (वेद) जाने (सः, इत्) वही (उ) तर्क-वितर्क के साथ (शमिता) शान्ति करनेवाला (यजाति) यज्ञ करे ॥१०॥
Essence
इस मन्त्र में उपमा और वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे सूर्य्य की किरणें दिव्य गुणों को उत्पन्न करतीं और दोषों को दूर करती हैं, वैसे विद्वान् लोग जगत् में गुणों को उत्पन्न करके दोषों को दूर करें ॥१०॥
Subject
अब अग्नि के विषय को अगले मन्त्र में कहा है।