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Rigveda Mandal 3 / Sukta 4 / Mantra 1

62 Sukta
11 Mantra
3/4/1
Devata- आप्रियः Rishi- गाथिनो विश्वामित्रः Chhanda- स्वराट्पङ्क्ति Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
स॒मित्स॑मित्सु॒मना॑ बोध्य॒स्मे शु॒चाशु॑चा सुम॒तिं रा॑सि॒ वस्वः॑। आ दे॑व दे॒वान्य॒जथा॑य वक्षि॒ सखी॒ सखी॑न्त्सु॒मना॑ यक्ष्यग्ने॥

स॒मित्ऽस॑मित् । सु॒ऽमनाः॑ । बो॒धि॒ । अ॒स्मे इति॑ । शु॒चाऽशु॑चा । सु॒ऽम॒तिम् । रा॒सि॒ । वस्वः॑ । आ । दे॒व॒ । दे॒वान् । य॒जथा॑य । व॒क्षि॒ । सखा॑ । सखी॑न् । सु॒ऽमनाः॑ । य॒क्षि॒ । अ॒ग्ने॒ ॥

Mantra without Swara
समित्समित्सुमना बोध्यस्मे शुचाशुचा सुमतिं रासि वस्वः। आ देव देवान्यजथाय वक्षि सखी सखीन्त्सुमना यक्ष्यग्ने॥

समित्ऽसमित्। सुऽमनाः। बोधि। अस्मे इति। शुचाऽशुचा। सुऽमतिम्। रासि। वस्वः। आ। देव। देवान्। यजथाय। वक्षि। सखा। सखीन्। सुऽमनाः। यक्षि। अग्ने॥

Ashtak » 2 Adhyay » 8 Varga » 22 Mantra » 1

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Meaning
हे (अग्ने) अग्नि के समान प्रकाशमान विद्वन् ! आप जैसे (समित्समित्) प्रतिसमिध (शुचाशुचा) शुच् शुच् प्रत्येक होम के साधन से अग्नि (बोधि) प्रबुद्ध होता जाना जाता है वैसे पढ़ाने और उपदेश करने से (अस्मे) हमलोगों के लिये (सुमतिम्) उत्तम बुद्धि और (वस्वः) धनों को (रासि) देते हैं। हे (देव) विद्वन् ! (सुमनाः) सुन्दर मनवाले होते हुए आप आहुतियों को अग्नि के समान (यजथाय) समागम के लिये (देवान्) विद्वानों को (आ, वक्षि) प्राप्त करते हो (सुमनाः) सुन्दर हृदयवाले (सखा) मित्र होते हुए आप (सखीन्) मित्र वर्गों को (यक्षि) सङ्ग करते हो। उक्त कारण से सत्कार करने योग्य हो ॥१॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे विद्वानो ! जैसे समिधों वा होमने योग्य घृतादि पदार्थ से अग्नि बढ़ता है, वैसे अध्यापन और उपदेश से मनुष्यों की बुद्धि बढ़ानी चाहिये और आप लोग सदैव मित्र होकर सबको विद्वान् और श्रीमान् कीजिये ॥१॥
Subject
अब ग्यारह ऋचावाले चौथे सूक्त का प्रारम्भ है। उसके प्रथम मन्त्र में विद्वानों के विषय को कहते हैं।

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