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Rigveda Mandal 3 / Sukta 39 / Mantra 7

62 Sukta
9 Mantra
3/39/7
Devata- इन्द्र: Rishi- गोपवन आत्रेयः सप्तवध्रिर्वा Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
ज्योति॑र्वृणीत॒ तम॑सो विजा॒नन्ना॒रे स्या॑म दुरि॒ताद॒भीके॑। इ॒मा गिरः॑ सोमपाः सोमवृद्ध जु॒षस्वे॑न्द्र पुरु॒तम॑स्य का॒रोः॥

ज्योतिः॑ । वृ॒णी॒त॒ । तम॑सः । वि॒ऽजा॒नन् । आ॒रे । स्य॒म॒ । दुः॒ऽइ॒तात् । अ॒भीके॑ । इ॒माः । गिरः॑ । सो॒म॒ऽपाः॒ । सो॒म॒ऽवृ॒द्ध॒ । जु॒षस्व॑ । इ॒न्द्र॒ । पु॒रु॒ऽतम॑स्य । का॒रोः ॥

Mantra without Swara
ज्योतिर्वृणीत तमसो विजानन्नारे स्याम दुरितादभीके। इमा गिरः सोमपाः सोमवृद्ध जुषस्वेन्द्र पुरुतमस्य कारोः॥

ज्योतिः। वृणीत। तमसः। विऽजानन्। आरे। स्याम। दुःऽइतात्। अभीके। इमाः। गिरः। सोमऽपाः। सोमऽवृद्ध। जुषस्व। इन्द्र। पुरुऽतमस्य। कारोः॥

Ashtak » 3 Adhyay » 2 Varga » 26 Mantra » 2

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1 Bhashyas
Meaning
हे (सोमवृद्ध) विद्यारूप ऐश्वर्य्य से वृद्ध और (इन्द्र) अत्यन्त ऐश्वर्य्ययुक्त (सोमपाः) ऐश्वर्य्य की रक्षा करनेवाले ! आप (पुरुतमस्य) अत्यन्त बहुत विद्या से युक्त (कारोः) शिल्पीजन की जो (इमाः) उन (गिरः) वाणियों का (जुषस्व) सेवन करो और जैसे (विजानन्) विशेष प्रकार से जानते हुए आप हम लोगों से (आरे) दूरस्थल और (अभीके) समीप स्थल में (दुरितात्) दुष्ट आचरण से पृथक् होकर श्रेष्ठ आचरण और (तमसः) अविद्या से पृथक् होकर विद्या और (ज्योतिः) प्रकाश के समान विद्या को (वृणीत) स्वीकार करैं, वैसे इन आपकी उन वाणियों का सेवन करके हम लोग विद्वान् होवें ॥७॥
Essence
हे मनुष्यो ! जैसे हम लोग पाप के आचरण से पृथक् होकर धर्म के आचरण और अविद्या से पृथक् होकर विद्या का ग्रहण करके आत्मसम्बन्धी ज्ञान और शिल्प क्रिया कौशल का सेवन करते हैं, वैसे ही आप लोग भी सेवन करनेवाले हूजिये और हम सब लोग दूर और समीप में वर्त्तमान हुए भी मित्रता का त्याग नहीं करें ॥७॥
Subject
अब विद्वान् के विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं।