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Rigveda Mandal 3 / Sukta 39 / Mantra 6

62 Sukta
9 Mantra
3/39/6
Devata- इन्द्र: Rishi- गोपवन आत्रेयः सप्तवध्रिर्वा Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
इन्द्रो॒ मधु॒ संभृ॑तमु॒स्रिया॑यां प॒द्वद्वि॑वेद श॒फव॒न्नमे॒ गोः। गुहा॑ हि॒तं गुह्यं॑ गू॒ळ्हम॒प्सु हस्ते॑ दधे॒ दक्षि॑णे॒ दक्षि॑णावान्॥

इन्द्रः॑ । मधु॑ । सम्ऽभृ॑तम् । उ॒स्रिया॑याम् । प॒त्ऽवत् । वि॒वे॒द॒ । श॒फऽव॑त् । नमे॑ । गोः । गुहा॑ । हि॒तम् । गुह्य॑म् । गू॒ळ्हम् । अ॒प्ऽसु । हस्ते॑ । द॒धे॒ । दक्षि॑णे । दक्षि॑णऽवान् ॥

Mantra without Swara
इन्द्रो मधु संभृतमुस्रियायां पद्वद्विवेद शफवन्नमे गोः। गुहा हितं गुह्यं गूळ्हमप्सु हस्ते दधे दक्षिणे दक्षिणावान्॥

इन्द्रः। मधु। सम्ऽभृतम्। उस्रियायाम्। पत्ऽवत्। विवेद। शफऽवत्। नमे। गोः। गुहा। हितम्। गुह्यम्। गूळ्हम्। अप्ऽसु। हस्ते। दधे। दक्षिणे। दक्षिणऽवान्॥

Ashtak » 3 Adhyay » 2 Varga » 26 Mantra » 1

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1 Bhashyas
Meaning
जो (इन्द्रः) बिजुली के समान मनुष्य (उस्रियायाम्) भूमि में (पद्वत्) पैरों के और (शफवत्) खुरों के सदृश (मधु) मधुर आदि रस (सम्भृतम्) जो कि उत्तम धारण किया गया उसे (नमे) नमें स्वीकार करे (विवेद) जाने (गोः) वाणी और (गुहा) बुद्धि में (हितम्) स्थित (अप्सु) प्राणों वा जलों में (गुह्यम्) गुप्त और (गूढ़म्) ढपे हुए व्यवहार को (दक्षिणावान् दक्षिणा को धारण किये हुए के समान (दक्षिणे) दाहिने (हस्ते) हाथ में (दधे) धारण करे उसको सब लोग जानो ॥६॥
Essence
इस मन्त्र में उपमा और वाचकलुप्तोपमालङ्कार हैं। जैसे मनुष्य पैरों और पशुखुरों में गमन करके दूसरे स्थान को प्रत्यक्ष करते हैं, वैसे ही बाहर भीतर वर्त्तमान बिजुली को विद्वान् पुरुष हस्तप्राप्त दक्षिणा के सदृश जानकर और हृदय में वर्त्तमान अपने आत्मा और परमात्मा तथा बाह्य सूर्य आदि को जानता है, इसके सहाय से धर्म अर्थ काम और मोक्षों को सब सिद्ध करें ॥६॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं।