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Rigveda Mandal 3 / Sukta 39 / Mantra 5

62 Sukta
9 Mantra
3/39/5
Devata- इन्द्र: Rishi- गोपवन आत्रेयः सप्तवध्रिर्वा Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
सखा॑ ह॒ यत्र॒ सखि॑भि॒र्नव॑ग्वैरभि॒ज्ञ्वा सत्व॑भि॒र्गा अ॑नु॒ग्मन्। स॒त्यं तदिन्द्रो॑ द॒शभि॒र्दश॑ग्वैः॒ सूर्यं॑ विवेद॒ तम॑सि क्षि॒यन्त॑म्॥

सखा॑ । ह॒ । यत्र॑ । सखि॑ऽभिः । नव॑ऽग्वैः । अ॒भि॒ऽज्ञु । आ । सत्व॑ऽभिः । गाः । अ॒नु॒ऽग्मन् । स॒त्यम् । तत् । इन्द्रः॑ । द॒शऽभिः॑ । दश॑ऽग्वैः । सूर्य॑म् । वि॒वे॒द॒ । तम॑सि । क्षि॒यन्त॑म् ॥

Mantra without Swara
सखा ह यत्र सखिभिर्नवग्वैरभिज्ञ्वा सत्वभिर्गा अनुग्मन्। सत्यं तदिन्द्रो दशभिर्दशग्वैः सूर्यं विवेद तमसि क्षियन्तम्॥

सखा। ह। यत्र। सखिऽभिः। नवऽग्वैः। अभिऽज्ञु। आ। सत्वऽभिः। गाः। अनुऽग्मन्। सत्यम्। तत्। इन्द्रः। दशऽभिः। दशऽग्वैः। सूर्यम्। विवेद। तमसि। क्षियन्तम्॥

Ashtak » 3 Adhyay » 2 Varga » 25 Mantra » 5

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Meaning
हे मनुष्यो ! (यत्र) जिस स्थल में (नवग्वैः) नवीन गतियों और (सखिभिः) मित्रों के साथ (अभिज्ञु) सन्मुख जांघों से युक्त (सखा) मित्र (सत्त्वभिः) पदार्थों के साथ (ह) निश्चय (गाः) उत्तम प्रकार शिक्षित वाणी वा भूमियों के (आ, अनुग्मन्) अनुकूल प्राप्त होता हुआ जो (सत्यम्) श्रेष्ठ व्यवहारों में उत्तम अर्थात् सच्चापन जैसे हो वैसे (दशग्वैः) दश प्रकार की गतियों से युक्त (दशभिः) दश प्रकार के पवनों के साथ (इन्द्रः) बिजुली (तमसि) रात्रि में (क्षियन्तम्) निवास करते अर्थात् अपना काम प्रकाश न करते हुए (सूर्यम्) सूर्य को (विवेद) प्राप्त होती है (तत्) उस को जो जानता है उसका अनुकरण सब लोग करो ॥५॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे मित्र के तुल्य वर्त्तमान वायु से बिजुली नामक अग्नि अन्धकार में सूर्य के परिणाम को प्राप्त हो और सबको प्रकाशित कर आनन्द देती है, वैसे ही धार्मिक मित्रों के सहित मित्र विद्वान् शुद्धान्तःकरणता तथा विद्या से प्रकट होकर सबके आत्माओं का प्रकाश करके आनन्द देता है ॥५॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं।