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Rigveda Mandal 3 / Sukta 39 / Mantra 4

62 Sukta
9 Mantra
3/39/4
Devata- इन्द्र: Rishi- गोपवन आत्रेयः सप्तवध्रिर्वा Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
नकि॑रेषां निन्दि॒ता मर्त्ये॑षु॒ ये अ॒स्माकं॑ पि॒तरो॒ गोषु॑ यो॒धाः। इन्द्र॑ एषां दृंहि॒ता माहि॑नावा॒नुद्गो॒त्राणि॑ ससृजे दं॒सना॑वान्॥

नकिः॑ । ए॒षा॒म् । नि॒न्दि॒ता । मर्त्ये॑षु । ये । अ॒स्माक॑म् । पि॒तरः॑ । गोषु॑ । यो॒धाः । इन्द्रः॑ । ए॒षा॒म् । दृं॒हि॒ता । माहि॑नऽवान् । उत् । गो॒त्राणि॑ । स॒सृ॒जे॒ । दं॒सना॑ऽवान् ॥

Mantra without Swara
नकिरेषां निन्दिता मर्त्येषु ये अस्माकं पितरो गोषु योधाः। इन्द्र एषां दृंहिता माहिनावानुद्गोत्राणि ससृजे दंसनावान्॥

नकिः। एषाम्। निन्दिता। मर्त्येषु। ये। अस्माकम्। पितरः। गोषु। योधाः। इन्द्रः। एषाम्। दृंहिता। माहिनऽवान्। उत्। गोत्राणि। ससृजे। दंसनाऽवान्॥

Ashtak » 3 Adhyay » 2 Varga » 25 Mantra » 4

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1 Bhashyas
Meaning
हे मनुष्यो ! जो (इन्द्रः) सूर्य्य के सदृश वर्त्तमान (ये) वा जो (अस्माकम्) हम लोगों के (गोषु) पृथिवियों और (मर्त्येषु) मनुष्यों में (योधाः) योद्धा लोग और (पितरः) पालन करनेवाले हैं (एषाम्) इन लोगों का (दृंहिता) बढ़ानेवाला (माहिनावान्) प्रशंसित पूजन हैं जिसके वह और (दंशनावान्) जो उत्तम कर्मों से युक्त है वह (गोत्राणि) वंशों को (उत्, ससृजे) उत्पन्न करता है उसकी सेवा करो। जिससे (एषाम्) इन लोगों का (निन्दिता) गुणों में दोषों का आरोपक और दोषों में गुणों का आरोपक (नकिः) नहीं होवे ॥४॥
Essence
मनुष्यों को चाहिये कि ऐसा प्रयत्न करें कि जिससे निन्दित न हों और आप दूसरों की स्तुति करनेवाले हों और जैसे सूर्य्य संपूर्ण जगत् का पालन करता है, वैसे रक्षा करनेवाले पितरों की सेवा करनी चाहिये ॥४॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं।