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Rigveda Mandal 3 / Sukta 39 / Mantra 1

62 Sukta
9 Mantra
3/39/1
Devata- इन्द्र: Rishi- गोपवन आत्रेयः सप्तवध्रिर्वा Chhanda- विराट्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
इन्द्रं॑ म॒तिर्हृ॒द आ व॒च्यमा॒नाच्छा॒ पतिं॒ स्तोम॑तष्टा जिगाति। या जागृ॑विर्वि॒दथे॑ श॒स्यमा॒नेन्द्र॒ यत्ते॒ जाय॑ते वि॒द्धि तस्य॑॥

इन्द्र॑म् । म॒तिः । हृ॒दः । आ । व॒च्यमा॑ना । अच्छ॑ । पति॑म् । स्तोम॑ऽतष्टा । जि॒गा॒ति॒ । या । जागृ॑विः । वि॒दथे॑ । श॒स्यमा॑ना । इन्द्र॑ । यत् । ते॒ । जाय॑ते । वि॒द्धि । तस्य॑ ॥

Mantra without Swara
इन्द्रं मतिर्हृद आ वच्यमानाच्छा पतिं स्तोमतष्टा जिगाति। या जागृविर्विदथे शस्यमानेन्द्र यत्ते जायते विद्धि तस्य॥

इन्द्रम्। मतिः। हृदः। आ। वच्यमाना। अच्छ। पतिम्। स्तोमऽतष्टा। जिगाति। या। जागृविः। विदथे। शस्यमाना। इन्द्र। यत्। ते। जायते। विद्धि। तस्य॥

Ashtak » 3 Adhyay » 2 Varga » 25 Mantra » 1

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1 Bhashyas
Meaning
हे (इन्द्र) अत्यन्त ऐश्वर्य्ययुक्त विद्वान् पुरुष ! (या) जो (वच्यमाना) कही गई (विदथे) विज्ञान में (जागृविः) जागनेवाली और विज्ञान में (शस्यमाना) स्तुति से युक्त हुई (स्तोमतष्टा) स्तुतियों से विस्तारयुक्त (मतिः) बुद्धि (हृदः) हृदय से (इन्द्रम्) अत्यन्त सुख देने (पतिम्) और पालनेवाले स्वामी की (अच्छ) उत्तम प्रकार (आ) सब ओर से (जिगाति) स्तुति करती हैं (यत्) जो बुद्धि (ते) आपकी (जायते) उत्पन्न होती है उस बुद्धि से (तस्य) उस पालनेवाले के उत्तम गुण कर्म और स्वभावों को (विद्धि) जानो ॥१॥
Essence
जिनके हृदय में यथार्थ ज्ञान उत्पन्न होता है, वे सब लोगों के गुण और दोषों को जान गुणों को ग्रहण दोषों का त्याग गुणों की प्रशंसा और दोषों की निन्दा करके उत्तम कर्मों को करें, ऐसा होने से वे इस संसार में प्रशंसायुक्त होवें ॥१॥
Subject
अब नव ऋचावाले तीसरे मण्डल में उनतालीसवें सूक्त का आरम्भ है। उसके प्रथम मन्त्र में विद्वान् के विषय को कहते हैं।