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Rigveda Mandal 3 / Sukta 38 / Mantra 8

62 Sukta
10 Mantra
3/38/8
Devata- इन्द्र: Rishi- प्रजापतिः Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
तदिन्न्व॑स्य सवि॒तुर्नकि॑र्मे हिर॒ण्ययी॑म॒मतिं॒ यामशि॑श्रेत्। आ सु॑ष्टु॒ती रोद॑सी विश्वमि॒न्वे अपी॑व॒ योषा॒ जनि॑मानि वव्रे॥

तत् । इत् । नु । अ॒स्य॒ । स॒वि॒तुः । नकिः॑ । मे॒ । हि॒र॒ण्ययी॑म् । अ॒मति॑म् । याम् । अशि॑श्रेत् । आ । सु॒ऽस्तु॒ती । रोद॑सी॒ इति॑ । वि॒श्व॒मि॒न्वे इति॑ वि॒श्व॒म्ऽइ॒न्वे । अपि॑ऽइव । योषा॑ । जनि॑मानि । व॒व्रे॒ ॥

Mantra without Swara
तदिन्न्वस्य सवितुर्नकिर्मे हिरण्ययीममतिं यामशिश्रेत्। आ सुष्टुती रोदसी विश्वमिन्वे अपीव योषा जनिमानि वव्रे॥

तत्। इत्। नु। अस्य। सवितुः। नकिः। मे। हिरण्ययीम्। अमतिम्। याम्। अशिश्रेत्। आ। सुऽस्तुती। रोदसी इति। विश्वमिन्वे इति विश्वम्ऽइन्वे। अपिऽइव। योषा। जनिमानि। वव्रे॥

Ashtak » 3 Adhyay » 2 Varga » 24 Mantra » 3

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1 Bhashyas
Meaning
जो (अस्य) इस (सवितुः) सूर्य्य की प्रगटता से उत्पन्न हुए प्रकाश के सदृश (याम्) जिस (हिरण्ययीम्) सुवर्ण आदि बहुत रत्नों से युक्त (अमतिम्) उत्तम शोभायुक्त लक्ष्मी को (योषा) स्त्री (अपीव) इकट्ठा की गई सी (जनिमानि) जन्मों को (वव्रे) स्वीकार करती और (सुष्टुती) उत्तम प्रशंसा से (विश्वमिन्वे) सर्वत्र व्यापक (रोदसी) प्रकाश और पृथिवी के सदृश राजा और प्रजा के व्यवहारों का (नु) निश्चय (आ, अशिश्रेत्) आश्रय करै (तत्) वह (इत्) ही (मे) मेरे (नकिः) नहीं हुई ॥८॥
Essence
इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जैसे चन्द्र आदि लोक सूर्य के प्रकाश का आश्रय करके उत्तम शोभित देख पड़ते हैं और जैसे स्त्री स्नेहपात्र अपने प्रिय और उत्तम लक्षणों से युक्त पति को प्राप्त होकर सन्तानों को उत्पन्न करके आनन्द करती है, वैसे ही पृथिवी के राज्य को प्राप्त होकर दुःखों से रहित हुए राजजन निरन्तर आनन्द करैं ॥८॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं।