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Rigveda Mandal 3 / Sukta 38 / Mantra 6

62 Sukta
10 Mantra
3/38/6
Devata- इन्द्र: Rishi- प्रजापतिः Chhanda- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
त्रीणि॑ राजाना वि॒दथे॑ पु॒रूणि॒ परि॒ विश्वा॑नि भूषथः॒ सदां॑सि। अप॑श्य॒मत्र॒ मन॑सा जग॒न्वान्व्र॒ते ग॑न्ध॒र्वाँ अपि॑ वा॒युके॑शान्॥

त्रीणि॑ । रा॒जा॒ना॒ । वि॒दथे॑ । पु॒रूणि॑ । परि॑ । विश्वा॑नि । भू॒ष॒थः॒ । सदां॑सि । अप॑श्यम् । अत्र॑ । मन॑सा । ज॒ग॒न्वान् । व्र॒ते । ग॒न्ध॒र्वान् । अपि॑ । वा॒युऽके॑शान् ॥

Mantra without Swara
त्रीणि राजाना विदथे पुरूणि परि विश्वानि भूषथः सदांसि। अपश्यमत्र मनसा जगन्वान्व्रते गन्धर्वाँ अपि वायुकेशान्॥

त्रीणि। राजाना। विदथे। पुरूणि। परि। विश्वानि। भूषथः। सदांसि। अपश्यम्। अत्र। मनसा। जगन्वान्। व्रते। गन्धर्वान्। अपि। वायुऽकेशान्॥

Ashtak » 3 Adhyay » 2 Varga » 24 Mantra » 1

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1 Bhashyas
Meaning
हे (राजाना) राजा और प्रजाजनो ! मैं इस संसार में वर्त्तमान जिन (व्रते) सत्यभाषणादि व्यवहार में (गन्धर्वान्) उत्तम प्रकार शिक्षित वाणी वा पृथिवी को धारण करने और (वायुकेशान्) वायु के सदृश प्रकाशवाले तथा अन्य भी शिष्ट अर्थात् उत्तम पुरुषों को (मनसा) विज्ञान से (जगन्वान्) प्राप्त हुआ (अपश्यम्) देखता हूँ उन लोगों से (त्रीणि) तीन (सदांसि) सभायें नियत कराके (विदथे) विज्ञान को प्राप्त करानेवाले व्यवहार में (पुरूणि) बहुत (विश्वानि) सम्पूर्ण व्यवहारों को (परि) सब प्रकार (भूषथः) शोभित करते हो, इससे सम्पूर्ण कार्य्यों के सिद्ध करनेवाले होते हो ॥६॥
Essence
हे मनुष्यो ! आप लोग उत्तम गुण कर्म और स्वभाववाले यथार्थवक्ता विद्वान् पुरुषों की राजसभा विद्यासभा और धर्मसभा नियत कर और सम्पूर्ण राज्यसम्बन्धी कर्मों को यथायोग्य सिद्ध कर सकल प्रजा को निरन्तर सुख दीजिये ॥६॥
Subject
अब सभा के कार्य्य का उपदेश अगले मन्त्र में किया है।