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Rigveda Mandal 3 / Sukta 38 / Mantra 5

62 Sukta
10 Mantra
3/38/5
Devata- इन्द्र: Rishi- प्रजापतिः Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
असू॑त॒ पूर्वो॑ वृष॒भो ज्याया॑नि॒मा अ॑स्य शु॒रुधः॑ सन्ति पू॒र्वीः। दिवो॑ नपाता वि॒दथ॑स्य धी॒भिः क्ष॒त्रं रा॑जाना प्र॒दिवो॑ दधाथे॥

असू॑त । पूर्वः॑ । वृ॒ष॒भः । ज्याया॑न् । इ॒माः । अ॒स्य॒ । शु॒रुधः॑ । स॒न्ति॒ । पू॒र्वीः । दिवः॑ । न॒पा॒ता॒ । वि॒दथ॑स्य । धी॒भिः । क्ष॒त्रम् । रा॒जा॒ना॒ । प्र॒ऽदिवः॑ । द॒धा॒थे॒ इति॑ ॥

Mantra without Swara
असूत पूर्वो वृषभो ज्यायानिमा अस्य शुरुधः सन्ति पूर्वीः। दिवो नपाता विदथस्य धीभिः क्षत्रं राजाना प्रदिवो दधाथे॥

असूत। पूर्वः। वृषभः। ज्यायान्। इमाः। अस्य। शुरुधः। सन्ति। पूर्वीः। दिवः। नपाता। विदथस्य। धीभिः। क्षत्रम्। राजाना। प्रऽदिवः। दधाथे इति॥

Ashtak » 3 Adhyay » 2 Varga » 23 Mantra » 5

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1 Bhashyas
Meaning
हे (नपाता) नाशरहित (राजाना) सूर्य्य और बिजुली के सदृश प्रकाशयुक्त राजा और न्यायाधीश ! आप दोनों जैसे (पूर्वः) पालन करनेवाला प्रथम (वृषभः) वृष्टिकर्त्ता (ज्यायान्) बड़ा वृद्ध (इमाः) इन (पूर्वीः) प्राचीन (शुरुधः) शीघ्र रुचिकारकों को (असूत) उत्पन्न करता है और (अस्य) इसके समीप से वृष्टिका वर्षायें हैं वैसे ही (दिवः) अन्तरिक्ष से (विदथस्य) विज्ञान करनेवाले के (प्रदिवः) विद्या और विनय के प्रकाशों को तथा (धीभिः) बुद्धि वा कर्मों से (क्षत्रम्) रक्षा करने योग्य राज्य को (दधाथे) धारण करते हो ॥५॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे क्रम से सूर्य्य जल के धारण और वृष्टि से इस संसार का हित करता है, वैसे ही उत्तम गुण और न्यायों के सहित वर्त्तमान हुए राजा आदि लोग उत्तम प्रकार रक्षित राज्य का पालन करैं ॥५॥
Subject
अब राजा के विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं।