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Rigveda Mandal 3 / Sukta 38 / Mantra 1

62 Sukta
10 Mantra
3/38/1
Devata- इन्द्र: Rishi- प्रजापतिः Chhanda- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
अ॒भि तष्टे॑व दीधया मनी॒षामत्यो॒ न वा॒जी सु॒धुरो॒ जिहा॑नः। अ॒भि प्रि॒याणि॒ मर्मृ॑श॒त्परा॑णि क॒वीँरि॑च्छामि सं॒दृशे॑ सुमे॒धाः॥

अ॒भि । तष्टा॑ऽइव । दी॒ध॒य॒ । म॒नी॒षाम् । अत्यः॑ । न । वा॒जी । सु॒ऽधुरः॑ । जिहा॑नः । अ॒भि । प्रि॒याणि॑ । मर्मृ॑शत् । परा॑णि । क॒वीन् । इ॒च्छा॒मि॒ । स॒म्ऽदृशे॑ । सु॒ऽमे॒धाः ॥

Mantra without Swara
अभि तष्टेव दीधया मनीषामत्यो न वाजी सुधुरो जिहानः। अभि प्रियाणि मर्मृशत्पराणि कवीँरिच्छामि संदृशे सुमेधाः॥

अभि। तष्टाऽइव। दीधय। मनीषाम्। अत्यः। न। वाजी। सुऽधुरः। जिहानः। अभि। प्रियाणि। मर्मृशत्। पराणि। कवीन्। इच्छामि। सम्ऽदृशे। सुऽमेधाः॥

Ashtak » 3 Adhyay » 2 Varga » 23 Mantra » 1

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1 Bhashyas
Meaning
हे विद्वान् पुरुष ! जैसे मैं (संदृशे) उत्तम प्रकार दर्शन के लिये (कवीन्) धार्मिक विद्वानों की (इच्छामि) इच्छा करता हूँ वैसे (सुमेधाः) उत्तम बुद्धिवाले (जिहानः) प्राप्त होते और (पराणि) परम उत्तम (प्रियाणि) कामना और आदर करने योग्य सुखों को (अभि, मर्मृशत्) अत्यन्त विचारते हुए (सुधुरः) सुन्दर धुरा को धारण किये हुए (अत्यः) निरन्तर चलनेवाले (वाजी) वेगयुक्त घोड़े के (न) समान (मनीषाम्) बुद्धि को (तष्टेव) काष्ठों के सूक्ष्मत्व अर्थात् छीलने से पतले करनेवाले बढ़ई के सदृश आप (अभि) सन्मुख (दीधय) प्रकाश करो ॥१॥
Essence
इस मन्त्र में उपमा और वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे धुरियों के धारण करनेवाले उत्तम प्रकार शिक्षित घोड़े वाञ्छित कर्मों को सिद्ध करते हैं, वैसे ही साधारण जन विद्वानों की उत्तम बुद्धि को ग्रहण करके बढ़ई के सदृश व्यसनों का छेदन करैं ॥१॥
Subject
अब दश ऋचावाले अड़तीसवें सूक्त का प्रारम्भ है। उसके प्रथम मन्त्र में विद्वान् के विषय को कहते हैं।