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Rigveda Mandal 3 / Sukta 37 / Mantra 9

62 Sukta
11 Mantra
3/37/9
Devata- इन्द्र: Rishi- गोपवन आत्रेयः सप्तवध्रिर्वा Chhanda- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
इ॒न्द्रि॒याणि॑ शतक्रतो॒ या ते॒ जने॑षु प॒ञ्चसु॑। इन्द्र॒ तानि॑ त॒ आ वृ॑णे॥

इ॒न्द्रि॒याणि॑ । श॒त॒क्र॒तो॒ इति॑ शतऽक्रतो । या । ते॒ । जने॑षु । प॒ञ्चऽसु॑ । इन्द्र॑ । तानि॑ । ते॒ । आ । वृ॒णे॒ ॥

Mantra without Swara
इन्द्रियाणि शतक्रतो या ते जनेषु पञ्चसु। इन्द्र तानि त आ वृणे॥

इन्द्रियाणि। शतक्रतो इति शतऽक्रतो। या। ते। जनेषु। पञ्चऽसु। इन्द्र। तानि। ते। आ। वृणे॥

Ashtak » 3 Adhyay » 2 Varga » 22 Mantra » 4

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1 Bhashyas
Meaning
हे (शतक्रतो) अपार बुद्धियुक्त (इन्द्र) ऐश्वर्य्य को योग करनेवाले ! पञ्चसु पाँच राज्य, सेना, कोश, दूतत्व, प्राड्विवाकत्व आदि पदवियों से युक्त अधिकारी और (जनेषु) प्रत्यक्ष अध्यक्षों में (या) जो (ते) आपके (इन्द्रियाणि) जीने के चिह्न हैं (तानि) उन (ते) आपके चिह्नों को मैं (आ) (वृणे) उत्तम गुणों से आच्छादन करता हूँ ॥९॥
Essence
वही पुरुष राज्य करने के योग्य है, जो मन्त्रियों के चरित्रों को नेत्र से रूप के सदृश प्रत्यक्ष करता है, जैसे शरीर के इन्द्रिय के गोलक अर्थात् काले तारेवाले नेत्र के संबन्ध से जीव के सम्पूर्ण कार्य्य सिद्ध होते हैं, वैसे राजा मन्त्री और सेना के योग से राजकार्यों को सिद्ध कर सकता है ॥९॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं।