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Rigveda Mandal 3 / Sukta 37 / Mantra 7

62 Sukta
11 Mantra
3/37/7
Devata- इन्द्र: Rishi- गोपवन आत्रेयः सप्तवध्रिर्वा Chhanda- निचृद्गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
द्यु॒म्नेषु॑ पृत॒नाज्ये॑ पृत्सु॒तूर्षु॒ श्रवः॑सु च। इन्द्र॒ साक्ष्वा॒भिमा॑तिषु॥

द्यु॒म्नेषु॑ । पृ॒त॒नाज्ये॑ । पृ॒त्सु॒तूर्षु॑ । श्रवः॑ऽसु । च॒ । इन्द्र॑ । साक्ष्व॑ । अ॒भिऽमा॑तिषु ॥

Mantra without Swara
द्युम्नेषु पृतनाज्ये पृत्सुतूर्षु श्रवःसु च। इन्द्र साक्ष्वाभिमातिषु॥

द्युम्नेषु। पृतनाज्ये। पृत्सुतूर्षु। श्रवःऽसु। च। इन्द्र। साक्ष्व। अभिऽमातिषु॥

Ashtak » 3 Adhyay » 2 Varga » 22 Mantra » 2

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Meaning
हे (इन्द्र) तेजस्वी पुरुष ! आप (पृत्सुतूर्षु) सेनाओं में शीघ्रता से नाश करनेवाले जनों वा (श्रवःसु) श्रवण वा अन्न आदि पदार्थों (द्युम्नेषु) वा यशस्वी वा धन की प्राप्ति करानेवाले विषयों में वा (पृतनाज्ये) सेना संबन्धी संग्राम में (साक्ष्व) सहन करो ॥७॥
Essence
जो विद्यमान धन आदि पदार्थ वीर सेना व्याख्यान देनेवाले और युद्ध के अभिमानी अपने प्रिय आनन्दित और पुष्ट पुरुषों के होने पर शत्रुओं के साथ संग्राम करते हैं, वे ही पुरुष निश्चित विजय को प्राप्त होते हैं ॥७॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं।

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