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Rigveda Mandal 3 / Sukta 37 / Mantra 6

62 Sukta
11 Mantra
3/37/6
Devata- इन्द्र: Rishi- गोपवन आत्रेयः सप्तवध्रिर्वा Chhanda- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
वाजे॑षु सास॒हिर्भ॑व॒ त्वामी॑महे शतक्रतो। इन्द्र॑ वृ॒त्राय॒ हन्त॑वे॥

वाजे॑षु । स॒स॒हिः । भ॒व॒ । त्वाम् । ई॒म॒हे॒ । श॒त॒क्र॒तो॒ इति॑ शतऽक्रतो । इन्द्र॑ । वृ॒त्राय॑ । हन्त॑वे ॥

Mantra without Swara
वाजेषु सासहिर्भव त्वामीमहे शतक्रतो। इन्द्र वृत्राय हन्तवे॥

वाजेषु। ससहिः। भव। त्वाम्। ईमहे। शतक्रतो इति शतऽक्रतो। इन्द्र। वृत्राय। हन्तवे॥

Ashtak » 3 Adhyay » 2 Varga » 22 Mantra » 1

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Meaning
हे (शतक्रतो) अति सूक्ष्म बुद्धियुक्त (इन्द्र) दुष्ट पुरुषों के दल के नाश करनेवाले ! हम लोग जिन (त्वाम्) आपको (वृत्राय) मेघ के सदृश शत्रु के (हन्तवे) नाश करने को (ईमहे) युद्ध के उपकारक वस्तुओं के साथ याचना करते हैं वह आप (वाजेषु) जिनमें बहुत अन्न और विज्ञान आदि सामग्री अपेक्षित हैं ऐसे संग्रामों में (सासहिः) अत्यन्त सहनेवाले (भव) हूजिये ॥६॥
Essence
जिस कर्म में जिसका स्थापन सभा करै, वह पुरुष उस अधिकार की यथायोग्य उन्नति करै और जिस अधिकार में जिसका नियोग होवै, वहाँ जो आज्ञा उसका वह कदाचित् उल्लङ्घन न करै ॥६॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं।

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