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Rigveda Mandal 3 / Sukta 37 / Mantra 5

62 Sukta
11 Mantra
3/37/5
Devata- इन्द्र: Rishi- गोपवन आत्रेयः सप्तवध्रिर्वा Chhanda- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
इन्द्रं॑ वृ॒त्राय॒ हन्त॑वे पुरुहू॒तमुप॑ ब्रुवे। भरे॑षु॒ वाज॑सातये॥

इन्द्र॑म् । वृ॒त्राय॑ । हन्त॑वे । पु॒रु॒ऽहू॒तम् । उप॑ । ब्रु॒वे॒ । भरे॑षु । वाज॑ऽसातये ॥

Mantra without Swara
इन्द्रं वृत्राय हन्तवे पुरुहूतमुप ब्रुवे। भरेषु वाजसातये॥

इन्द्रम्। वृत्राय। हन्तवे। पुरुऽहूतम्। उप। ब्रुवे। भरेषु। वाजऽसातये॥

Ashtak » 3 Adhyay » 2 Varga » 21 Mantra » 5

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1 Bhashyas
Meaning
हे सेना में वर्त्तमान वीर पुरुषो ! जिस प्रकार सेना का अधीश मैं (वृत्राय) न्याय के आवरण करनेवाले शत्रु के (हन्तवे) नाश के लिये तथा (भरेषु) संग्रामों में (वाजसातये) धन आदि को बाँटने के लिये (पुरुहूतम्) बहुतों से पुकारे वा प्रशंसा किये गये (इन्द्रम्) अत्यन्त ऐश्वर्य्य के देनेवाले राजा को (उप) समीप में (ब्रुवे) कहता हूँ वैसे आप लोग भी इसके समीप कहो ॥५॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जब संग्राम प्रवृत्त होवै तो योधाओं के प्रति अध्यक्ष पुरुषों को चाहिये कि जिस प्रकार विजय हो वैसा उपदेश दें और योद्धा लोग अधिष्ठाता पुरुषों की आज्ञा में सब प्रकार वर्त्तमान होवैं, ऐसा करने से कैसे पराजय हो ? ॥५॥
Subject
फिर राजविषय को अगले मन्त्र में कहते हैं।