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Rigveda Mandal 3 / Sukta 37 / Mantra 4

62 Sukta
11 Mantra
3/37/4
Devata- इन्द्र: Rishi- गोपवन आत्रेयः सप्तवध्रिर्वा Chhanda- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
पु॒रु॒ष्टु॒तस्य॒ धाम॑भिः श॒तेन॑ महयामसि। इन्द्र॑स्य चर्षणी॒धृतः॑॥

पु॒रु॒ऽस्तु॒तस्य॑ । धाम॑ऽभिः । श॒तेन॑ । म॒ह॒या॒म॒सि॒ । इन्द्र॑स्य । च॒र्ष॒णि॒ऽधृतः॑ ॥

Mantra without Swara
पुरुष्टुतस्य धामभिः शतेन महयामसि। इन्द्रस्य चर्षणीधृतः॥

पुरुऽस्तुतस्य। धामऽभिः। शतेन। महयामसि। इन्द्रस्य। चर्षणिऽधृतः॥

Ashtak » 3 Adhyay » 2 Varga » 21 Mantra » 4

Bhashya

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Meaning
हे मनुष्यो ! जैसे हम लोग (पुरुष्टुतस्य) बहुतों से प्रशंसा पाये हुए और (चर्षणीधृतः) मनुष्यों को धारण करनेवाले (इन्द्रस्य) अत्यन्त ऐश्वर्य्य से युक्त राजा का (शतेन) असङ्ख्य (धामभिः) जन्म स्थान और नामों से (महयामसि) पूजन करैं वैसे उस प्रशंसित का सत्कार आप लोग भी करो ॥४॥
Essence
मनुष्यों को चाहिये कि राजा आदि न्यायकारी जनों का सब प्रकार सत्कार करैं और राजा आदि भी प्रजाजनों का सदा सत्कार करैं, ऐसा करने पर राजा और प्रजा इन दोनों के मङ्गल की उन्नति होती है ॥४॥
Subject
अब प्रजा के गुणों को अगले मन्त्र में कहते हैं।

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