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Rigveda Mandal 3 / Sukta 37 / Mantra 11

62 Sukta
11 Mantra
3/37/11
Devata- इन्द्र: Rishi- गोपवन आत्रेयः सप्तवध्रिर्वा Chhanda- निचृदनुष्टुप् Swara- ऋषभः
Mantra with Swara
अ॒र्वा॒वतो॑ न॒ आ ग॒ह्यथो॑ शक्र परा॒वतः॑। उ॒ लो॒को यस्ते॑ अद्रिव॒ इन्द्रे॒ह तत॒ आ ग॑हि॥

अ॒र्वा॒ऽवतः॑ । नः॒ । आ । ग॒हि॒ । अथो॒ इति॑ । श॒क्र॒ । प॒रा॒ऽवतः॑ । ऊँ॒ इति॑ । लो॒कः । यः । ते॒ । अ॒द्रि॒ऽवः॒ । इन्द्र॑ । इ॒ह । ततः॑ । आ । ग॒हि॒ ॥

Mantra without Swara
अर्वावतो न आ गह्यथो शक्र परावतः। उ लोको यस्ते अद्रिव इन्द्रेह तत आ गहि॥

अर्वाऽवतः। नः। आ। गहि। अथो इति। शक्र। पराऽवतः। ऊँ इति। लोकः। यः। ते। अद्रिऽवः। इन्द्र। इह। ततः। आ। गहि॥

Ashtak » 3 Adhyay » 2 Varga » 22 Mantra » 6

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Meaning
हे (अद्रिवः) बहुत मेघों से युक्त सूर्य के सदृश वर्त्तमान (शक्र) सामर्थ्यवान् (इन्द्र) ऐश्वर्य्य से सुख के दाता ! (इह) इस संसार में (यः) जो (ते) आपका (लोकः) निवासस्थान है इस स्थान से (नः) हम लोगों को (आ, गहि) प्राप्त हूजिये (अथो) इसके अनन्तर (परावतः) दूर से भी हम लोगों को प्राप्त हूजिये (ततः) और इससे (आगहि) उत्तम प्रकार अन्य स्थान में जाइये ॥११॥
Essence
जैसे मनुष्य लोग प्रीति से राजा को बुलावैं और वह राजा उन प्रजाजनों के समीप अपने देश से प्राप्त हो और उस देश से अन्य देश में भी जाय, इस प्रकार राजा और प्रजा जन परस्पर स्नेह की वृद्धि के लिये कर्मों को निरन्तर करैं ॥११॥ इस सूक्त में राजा और प्रजा के कामों का वर्णन करने से इस सूक्त के अर्थ की इस सूक्त से पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये ॥ यह सैंतीसवाँ सूक्त और बाईसवाँ वर्ग समाप्त हुआ ॥
Subject
अब राजा और प्रजाविषय को परस्पर सम्बन्ध से कहते हैं।

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