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Rigveda Mandal 3 / Sukta 36 / Mantra 9

62 Sukta
11 Mantra
3/36/9
Devata- इन्द्र: Rishi- गोपवन आत्रेयः सप्तवध्रिर्वा Chhanda- विराट्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
आ तू भ॑र॒ माकि॑रे॒तत्परि॑ ष्ठाद्वि॒द्मा हि त्वा॒ वसु॑पतिं॒ वसू॑नाम्। इन्द्र॒ यत्ते॒ माहि॑नं॒ दत्र॒मस्त्य॒स्मभ्यं॒ तद्ध॑र्यश्व॒ प्र य॑न्धि॥

आ । तु । भ॒र॒ । माकिः॑ । ए॒तत् । परि॑ । स्था॒त् । वि॒द्म । हि । त्वा॒ । वसु॑ऽपतिम् । वसू॑नाम् । इन्द्र॑ । यत् । ते॒ । माहि॑नम् । दत्र॑म् । अस्ति॑ । अ॒स्मभ्य॑म् । तत् । ह॒रि॒ऽअ॒श्व॒ । प्र । य॒न्धि॒ ॥

Mantra without Swara
आ तू भर माकिरेतत्परि ष्ठाद्विद्मा हि त्वा वसुपतिं वसूनाम्। इन्द्र यत्ते माहिनं दत्रमस्त्यस्मभ्यं तद्धर्यश्व प्र यन्धि॥

आ। तु। भर। माकिः। एतत्। परि। स्थात्। विद्म। हि। त्वा। वसुऽपतिम्। वसूनाम्। इन्द्र। यत्। ते। माहिनम्। दत्रम्। अस्ति। अस्मभ्यम्। तत्। हरिऽअश्व। प्र। यन्धि॥

Ashtak » 3 Adhyay » 2 Varga » 20 Mantra » 4

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Meaning
हे (इन्द्र) ऐश्वर्य्य के देनेवाले ! (यत्) जो (ते) आपका (माहिनम्) अतिश्रेष्ठ (दत्रम्) दान (अस्ति) है (तत्) उसे (अस्मभ्यम्) हम लोगों के लिये आप (प्र, यन्धि) अच्छे प्रकार दीजिये और हे (हर्यश्व) वेगयुक्त घोड़ोंवाले आप (एतत्) इसको (माकिः)(परि, ष्ठात्) सब ओर से रोकिये (हि) जिससे कि (वसूनाम्) धनों के (वसुपतिम्) स्वामी (त्वा) आपको हम लोग (विद्म) जानैं, इससे (तु) शीघ्र फिर आप इस सबको (आ) सब ओर से (भर) धारण करो ॥९॥
Essence
विद्वान् जनों को चाहिये कि सम्पूर्ण जनों के प्रति ऐसा उपदेश देवैं कि आप लोग दोषों को त्याग गुणों को धारण और धन और ऐश्वर्य्य को प्राप्त होके अन्य सुपात्र पुरुषों के लिये देवैं ॥९॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं।

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