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Rigveda Mandal 3 / Sukta 36 / Mantra 8

62 Sukta
11 Mantra
3/36/8
Devata- इन्द्र: Rishi- गोपवन आत्रेयः सप्तवध्रिर्वा Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
ह्र॒दाइ॑व कु॒क्षयः॑ सोम॒धानाः॒ समीं॑ विव्याच॒ सव॑ना पु॒रूणि॑। अन्ना॒ यदिन्द्रः॑ प्रथ॒मा व्याश॑ वृ॒त्रं ज॑घ॒न्वाँ अ॑वृणीत॒ सोम॑म्॥

ह्र॒दाःऽइ॑व । कु॒क्षयः॑ । सो॒म॒ऽधानाः॑ । सम् । ई॒म् इति॑ । वि॒व्या॒च॒ । सव॑ना । पु॒रूणि॑ । अन्ना॑ । यत् । इन्द्रः॑ । प्र॒थ॒मा । वि । आश॑ । वृ॒त्रम् । ज॒घ॒न्वान् । अ॒वृ॒णी॒त॒ । सोम॑म् ॥

Mantra without Swara
ह्रदाइव कुक्षयः सोमधानाः समीं विव्याच सवना पुरूणि। अन्ना यदिन्द्रः प्रथमा व्याश वृत्रं जघन्वाँ अवृणीत सोमम्॥

ह्रदाःऽइव। कुक्षयः। सोमऽधानाः। सम्। ईम् इति। विव्याच। सवना। पुरूणि। अन्ना। यत्। इन्द्रः। प्रथमा। वि। आश। वृत्रम्। जघन्वान्। अवृणीत। सोमम्॥

Ashtak » 3 Adhyay » 2 Varga » 20 Mantra » 3

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1 Bhashyas
Meaning
जिस पुरुष के (कुक्षयः) दोनों ओर के उदर के अवयव (सोमधानाः) सोमरूप ओषधियों के बीजों से युक्त (ह्रदाइव) गम्भीर जलाशयों के सदृश वर्त्तमान हैं (यत्) तथा) जो (पुरूणि) बहुत (सवना) ओषधियों के उत्पन्न रसों से युक्त (प्रथमा) प्रसिद्ध (अन्ना) अन्न और (ईम्) जल को (सम्, विव्याच) छलता है वह (इन्द्रः) सूर्य्य के समान महाप्रकाशमान (वृत्रम्) मेघ के (जघन्वान्) नाश करनेवाले सूर्य्य के समान (सोमम्) ओषधियों के समूह का (अवृणीत) स्वीकार करता तथा स्वादुयुक्त पदार्थों का (वि, आश) स्वीकार करता है ॥८॥
Essence
इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जो पुरुष गम्भीर अभिप्राय से युक्त सूर्य्य के सदृश प्रतापी ऐश्वर्य्य के धारण करनेवाले अपने और दूसरों के दोषों को नाश करके एश्वर्य्य का स्वीकार करते हैं, वे ही प्रसन्नात्मा होते हैं ॥८॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं।