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Rigveda Mandal 3 / Sukta 36 / Mantra 7

62 Sukta
11 Mantra
3/36/7
Devata- इन्द्र: Rishi- गोपवन आत्रेयः सप्तवध्रिर्वा Chhanda- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
स॒मु॒द्रेण॒ सिन्ध॑वो॒ याद॑माना॒ इन्द्रा॑य॒ सोमं॒ सुषु॑तं॒ भर॑न्तः। अं॒शुं दु॑हन्ति ह॒स्तिनो॑ भ॒रित्रै॒र्मध्वः॑ पुनन्ति॒ धार॑या प॒वित्रैः॑॥

स॒मु॒द्रेण॑ । सिन्ध॑वः । याद॑मानाः । इन्द्रा॑य । सोम॑म् । सुषु॑तम् । भर॑न्तः । अं॒शुम् । दु॒ह॒न्ति॒ । ह॒स्तिनः॑ । भ॒रित्रैः॑ । मध्वः॑ । पु॒न॒न्ति॒ । धार॑या । प॒वित्रैः॑ ॥

Mantra without Swara
समुद्रेण सिन्धवो यादमाना इन्द्राय सोमं सुषुतं भरन्तः। अंशुं दुहन्ति हस्तिनो भरित्रैर्मध्वः पुनन्ति धारया पवित्रैः॥

समुद्रेण। सिन्धवः। यादमानाः। इन्द्राय। सोमम्। सुषुतम्। भरन्तः। अंशुम्। दुहन्ति। हस्तिनः। भरित्रैः। मध्वः। पुनन्ति। धारया। पवित्रैः॥

Ashtak » 3 Adhyay » 2 Varga » 20 Mantra » 2

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1 Bhashyas
Meaning
जो (समुद्रेण) सागर के साथ (सिन्धवः) नदियाँ जैसे वैसे विद्वानों के साथ मेल करके (इन्द्राय) ऐश्वर्य्य के लिये विद्या की (यादमानाः) याचना करते हुए (सुषुतम्) उत्तम प्रकार उत्पन्न (सोमम्) पदार्थों के समूह को (भरन्तः) धारण और पुष्ट करते हुए (हस्तिनः) उत्तम हाथों से युक्त पुरुष (मध्वः) मधुर गुणसम्बन्धी (पवित्रैः) उत्तम शुद्ध (भरित्रैः) धारण और पोषण किये गये धनों के साथ (धारया) तीक्ष्ण धार से (पुनन्ति) पवित्र करते हैं वे काम को (दुहन्ति) पूर्ण करते हैं ॥७॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे सब ओर से जल आदि का ग्रहण कर नदियाँ वेग से समुद्र को प्राप्त हो रत्नवाली और शुद्ध जलयुक्त होती हैं, वैसे ही ब्रह्मचर्य्य से विद्याओं को धारण करके तीक्ष्ण बुद्धि से पूर्णज्ञानवाले हो पवित्र हुए और परमेश्वर को प्राप्त होकर सिद्धियों से परिपूर्ण शुद्ध आनन्दी मनुष्य होते हैं ॥७॥
Subject
अब राजा और प्रजा के गुणों को अगले मन्त्र में कहते हैं।