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Rigveda Mandal 3 / Sukta 36 / Mantra 4

62 Sukta
11 Mantra
3/36/4
Devata- इन्द्र: Rishi- गोपवन आत्रेयः सप्तवध्रिर्वा Chhanda- भुरिक्पङ्क्ति Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
म॒हाँ अम॑त्रो वृ॒जने॑ विर॒प्श्यु१॒॑ग्रं शवः॑ पत्यते धृ॒ष्ण्वोजः॑। नाह॑ विव्याच पृथि॒वी च॒नैनं॒ यत्सोमा॑सो॒ हर्य॑श्व॒मम॑न्दन्॥

म॒हान् । अम॑त्रः । वृ॒जने॑ । वि॒ऽर॒प्शी । उ॒ग्रम् । शवः॑ । प॒त्य॒ते॒ । धृ॒ष्णु । ओजः॑ । न । अह॑ । वि॒व्या॒च॒ । पृ॒थि॒वी । च॒न । एन॑म् । यत् । सोमा॑सः । हरि॑ऽअश्वम् । अम॑न्दन् ॥

Mantra without Swara
महाँ अमत्रो वृजने विरप्श्यु१ग्रं शवः पत्यते धृष्ण्वोजः। नाह विव्याच पृथिवी चनैनं यत्सोमासो हर्यश्वममन्दन्॥

महान्। अमत्रः। वृजने। विऽरप्शी। उग्रम्। शवः। पत्यते। धृष्णु। ओजः। न। अह। विव्याच। पृथिवी। चन। एनम्। यत्। सोमासः। हरिऽअश्वम्। अमन्दन्॥

Ashtak » 3 Adhyay » 2 Varga » 19 Mantra » 4

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1 Bhashyas
Meaning
जो (अमत्रः) ज्ञानी (विरप्शी) अनेक प्रकार के प्रसिद्ध उपदेशों से पूर्ण (महान्) श्रेष्ठ (वृजने) बल में (उग्रम्) कठिन दृढ़ (शवः) बल और (धृष्णु) प्रचण्ड (ओजः) पराक्रम (पत्यते) प्राप्त होता है (एनम्) इसको कोई पुरुष (चन) कुछ (न) नहीं (विव्याच) छलता है (अह) हा ! इसको (पृथिवी) भूमि प्राप्त होवै (यत्) जिस (हर्यश्वम्) ले चलनेवाले घोड़ोंयुक्त जन को (सोमासः) ऐश्वर्य्य से युक्त पुरुष (अमन्दन्) पसन्द करैं वह उनको निरन्तर प्रसन्न करै ॥४॥
Essence
मनुष्यों में वही पुरुष श्रेष्ठ होता है, जो शरीर आत्मा सेना मित्र बल आरोग्य धर्म विद्या की वृद्धि करता है, वह छल आदि दोषों का त्याग करके सबका उपकार करता है ॥४॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं।