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Rigveda Mandal 3 / Sukta 36 / Mantra 2

62 Sukta
11 Mantra
3/36/2
Devata- इन्द्र: Rishi- गोपवन आत्रेयः सप्तवध्रिर्वा Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
इन्द्रा॑य॒ सोमाः॑ प्र॒दिवो॒ विदा॑ना ऋ॒भुर्येभि॒र्वृष॑पर्वा॒ विहा॑याः। प्र॒य॒म्यमा॑ना॒न्प्रति॒ षू गृ॑भा॒येन्द्र॒ पिब॒ वृष॑धूतस्य॒ वृष्णः॑॥

इन्द्रा॑य । सोमाः॑ । प्र॒ऽदिवः॑ । विदा॑नाः । ऋ॒भुः । येभिः॑ । वृष॑ऽपर्वा । विऽहा॑याः । प्र॒ऽय॒म्यमा॑नान् । प्रति॑ । सु । गृ॒भा॒य॒ । इन्द्र॑ । पिब॑ । वृष॑ऽधूतस्य । वृष्णः॑ ॥

Mantra without Swara
इन्द्राय सोमाः प्रदिवो विदाना ऋभुर्येभिर्वृषपर्वा विहायाः। प्रयम्यमानान्प्रति षू गृभायेन्द्र पिब वृषधूतस्य वृष्णः॥

इन्द्राय। सोमाः। प्रऽदिवः। विदानाः। ऋभुः। येभिः। वृषऽपर्वा। विऽहायाः। प्रऽयम्यमानान्। प्रति। सु। गृभाय। इन्द्र। पिब। वृषऽधूतस्य। वृष्णः॥

Ashtak » 3 Adhyay » 2 Varga » 19 Mantra » 2

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1 Bhashyas
Meaning
हे मनुष्यो ! जैसे (वृषपर्वा) समर्थ पालनोंवाला (विहायाः) अनर्थों का नाशकारी (ऋभुः) बुद्धिमान् जन (येभिः) जिन लोगों से (प्रयम्यमानान्) अत्यन्त नियमयुक्तों को जानता है वैसे (इन्द्राय) अत्यन्त ऐश्वर्य्य के लिये (सोमाः) उत्पन्न करनेवाले वा उत्पन्न किये गये पदार्थ (प्रदिवः) प्रकाशित विद्यायुक्त (विदानाः) प्राप्त हुए हों इनको आप लोग जानिये हे (इन्द्र) ऐश्वर्य्य से युक्त पुरुष ! आप इन लोगों को (प्रति, सु, गृभाय) अच्छे प्रकार ग्रहण कीजिये और (वृषधूतस्य) सेचनों से मथे हुए (वृष्णः) बढ़ानेवाले रस का (पिब) पान कीजिये ॥२॥
Essence
हे मनुष्यो ! इस संसार में जैसे श्रेष्ठ यथार्थवक्ता पुरुष दुष्ट व्यवहार का त्याग और श्रेष्ठ आचरण का ग्रहण करके नियमित आहार विहार से रोगरहित और अधिक अवस्थावाले होते हैं, वैसे ही आप लोग भी हूजिये ॥२॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं।