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Rigveda Mandal 3 / Sukta 36 / Mantra 1

62 Sukta
11 Mantra
3/36/1
Devata- इन्द्र: Rishi- गोपवन आत्रेयः सप्तवध्रिर्वा Chhanda- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
इ॒मामू॒ षु प्रभृ॑तिं सा॒तये॑ धाः॒ शश्व॑च्छश्वदू॒तिभि॒र्याद॑मानः। सु॒तेसु॑ते वावृधे॒ वर्ध॑नेभि॒र्यः कर्म॑भिर्म॒हद्भिः॒ सुश्रु॑तो॒ भूत्॥

इमाम् । ऊँ॒ इति॑ । सु । प्रऽभृ॑तिम् । सा॒तये॑ । धाः॒ । शश्व॑त्ऽशश्वत् । ऊ॒तिऽभिः॑ । याद॑मानः । सु॒तेऽसु॑ते । व॒वृ॒धे॒ । वर्ध॑नेभिः । यः । कर्म॑ऽभिः । म॒हत्ऽभिः॑ । सुऽश्रु॑तः । भूत् ॥

Mantra without Swara
इमामू षु प्रभृतिं सातये धाः शश्वच्छश्वदूतिभिर्यादमानः। सुतेसुते वावृधे वर्धनेभिर्यः कर्मभिर्महद्भिः सुश्रुतो भूत्॥

इमाम्। ऊँ इति। सु। प्रऽभृतिम्। सातये। धाः। शश्वत्ऽशश्वत्। ऊतिऽभिः। यादमानः। सुतेऽसुते। ववृधे। वर्धनेभिः। यः। कर्मऽभिः। महत्ऽभिः। सुऽश्रुतः। भूत्॥

Ashtak » 3 Adhyay » 2 Varga » 19 Mantra » 1

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1 Bhashyas
Meaning
हे विद्वान् पुरुष ! (यः) जो विद्या की (यादमानः) याचना करते हुए आप (ऊतिभिः) रक्षण आदिकों से (सातये) संविभाग के लिये (इमाम्) इस (प्रभृतिम्) उत्तम धारणा और (शश्वच्छश्वत्) व्यापक व्यापक वस्तु को (सु) उत्तम प्रकार (धाः) धारण करें (वर्धनेभिः) वृद्धि के साधनों और (महद्भिः) बड़े (कर्मभिः) करनेवाले के अतीव चाहे हुए व्यवहारों से (सुतेसुते) उत्पन्न-उत्पन्न हुए पदार्थ में (वावृधे) बढ़ें (उ) वही (सुश्रुतः) उत्तम प्रकार श्रोता (भूत्) होवें ॥१॥
Essence
जो मनुष्य कार्य्य के विज्ञान का प्रारम्भ करके पर पर अर्थात् बड़े से छोटे उससे और छोटे उससे भी छोटे इत्यादि सूक्ष्म कारण पर्य्यन्त व्यापक परमाणुरूप पदार्थ को जानकर उपयोग करें कार्य में लावें, वे इस संसार में अत्यन्त वृद्धि को प्राप्त होवैं और जो लोग विद्वान् जनों से केवल विद्या की ही याचना करते हैं, वे बहुश्रुत होते हैं ॥१॥
Subject
अब ग्यारह ऋचावाले छत्तीसवें सूक्त का प्रारम्भ है। उसके पहिले मन्त्र से मनुष्य किस प्रकार के आचरण से सुख को प्राप्त हों, इस विषय को अगले मन्त्र में कहा है।