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Rigveda Mandal 3 / Sukta 35 / Mantra 9

62 Sukta
11 Mantra
3/35/9
Devata- इन्द्र: Rishi- गोपवन आत्रेयः सप्तवध्रिर्वा Chhanda- विराट्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
याँ आभ॑जो म॒रुत॑ इन्द्र॒ सोमे॒ ये त्वामव॑र्ध॒न्नभ॑वन्ग॒णस्ते॑। तेभि॑रे॒तं स॒जोषा॑ वावशा॒नो॒३॒॑ग्नेः पि॑ब जि॒ह्वया॒ सोम॑मिन्द्र॥

यान् । आ । अभ॑जः । म॒रुतः॑ । इ॒न्द्र॒ । सोमे॑ । ये । त्वाम् । अव॑र्धन् । अभ॑वन् । ग॒णः । ते॒ । तेभिः॑ । ए॒तम् । स॒ऽजोषाः॑ । वा॒व॒शा॒नः । अ॒ग्नेः । पि॒ब॒ । जि॒ह्वया॑ । सोम॑म् । इ॒न्द्र॒ ॥

Mantra without Swara
याँ आभजो मरुत इन्द्र सोमे ये त्वामवर्धन्नभवन्गणस्ते। तेभिरेतं सजोषा वावशानो३ग्नेः पिब जिह्वया सोममिन्द्र॥

यान्। आ। अभजः। मरुतः। इन्द्र। सोमे। ये। त्वाम्। अवर्धन्। अभवन्। गणः। ते। तेभिः। एतम्। सऽजोषाः। वावशानः। अग्नेः। पिब। जिह्वया। सोमम्। इन्द्र॥

Ashtak » 3 Adhyay » 2 Varga » 18 Mantra » 4

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Meaning
हे (इन्द्र) सम्पूर्ण ऐश्वर्य्य के देनेवाले ! आप ऐश्वर्य्य में (यान्) जिन विद्वानों को (मरुतः) प्राणों के सदृश प्रिय और श्रेष्ठ जान के (आ, अभजः) सेवन करो (ये) जो लोग (सोमे) ऐश्वर्य्य में (त्वाम्) आपकी (अवर्धन्) वृद्धि करैं जो (ते) आपका (गणः) समूह उसको प्राप्त होके आनन्दित (अभवन्) होवें (तेभिः) उन लोगों के साथ हे (इन्द्र) दुःख के नाश करनेवाले ! (सजोषाः) तुल्य प्रीति के सेवनकर्त्ता (वावशानः) अत्यन्त कामना करते हुए आप (अग्नेः) अग्नि की (जिह्वया) ज्वाला के सदृश वर्त्तमान गुण से (एतम्) इस (सोमम्) सोम रस का (पिब) पान करो ॥९॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो प्राण के सदृश प्रिय और श्रेष्ठ विद्वान् जनों की मनुष्य लोग सेवा करैं तो इन मनुष्यों की वे विद्वान् लोग सब प्रकार वृद्धि करैं और जैसे अग्नि ज्वाला से सम्पूर्ण रसों का पान करता है, वैसे ही तीक्ष्ण क्षुधा के सहित वर्त्तमान पुरुष अन्न का भोजन करै और पान करने योग्य वस्तु का पान करै ॥९॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं।

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