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Rigveda Mandal 3 / Sukta 35 / Mantra 10

62 Sukta
11 Mantra
3/35/10
Devata- इन्द्र: Rishi- गोपवन आत्रेयः सप्तवध्रिर्वा Chhanda- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
इन्द्र॒ पिब॑ स्व॒धया॑ चित्सु॒तस्या॒ग्नेर्वा॑ पाहि जि॒ह्वया॑ यजत्र। अ॒ध्व॒र्योर्वा॒ प्रय॑तं शक्र॒ हस्ता॒द्धोतु॑र्वा य॒ज्ञं ह॒विषो॑ जुषस्व॥

इन्द्र॑ । पिब॑ । स्व॒धया॑ । चि॒त् । सु॒तस्य॑ । अ॒ग्नेः । वा॒ । पा॒हि॒ । जि॒ह्वया॑ । य॒ज॒त्र॒ । अ॒ध्व॒र्योः । वा॒ । प्रऽय॑तम् । श॒क्र॒ । हस्ता॑त् । होतुः॑ । वा॒ । य॒ज्ञम् । ह॒विषः॑ । जु॒ष॒स्व॒ ॥

Mantra without Swara
इन्द्र पिब स्वधया चित्सुतस्याग्नेर्वा पाहि जिह्वया यजत्र। अध्वर्योर्वा प्रयतं शक्र हस्ताद्धोतुर्वा यज्ञं हविषो जुषस्व॥

इन्द्र। पिब। स्वधया। चित्। सुतस्य। अग्नेः। वा। पाहि। जिह्वया। यजत्र। अध्वर्योः। वा। प्रऽयतम्। शक्र। हस्तात्। होतुः। वा। यज्ञम्। हविषः। जुषस्व॥

Ashtak » 3 Adhyay » 2 Varga » 18 Mantra » 5

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Meaning
हे (यजत्र) आदर करने योग्य (शक्र) शक्तिमान् (इन्द्र) ऐश्वर्य्यवाले ! आप (अग्नेः) अग्नि की (जिह्वया) ज्वाला के सदृश वर्त्तमान लपट से (वा) वा (स्वधया) अन्न से (चित्) भी (सुतस्य) सिद्ध हुए रस का (पिब) पान करिये (अध्वर्योः) आत्मसम्बन्धी यज्ञ की इच्छा करते हुए पुरुष के (वा) अथवा (प्रयतम्) प्रयत्न से सिद्ध (यज्ञम्) यज्ञ का (पाहि) पालन करो (होतुः) देनेवाले के (हस्तात्) हाथ और (हविषः) हवन की सामग्री से (वा) अथवा यज्ञ का (जुषस्व) सेवन करो ॥१०॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जिन मनुष्यों से उत्तम प्रकार सिद्ध किये हुए अन्न का भोजन और रस का पान कर रोगरहित हो और विद्वानों के साथ मेल करके यज्ञ का सेवन किया जाय, वे सदा सुखी होवैं ॥१०॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं।

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