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Rigveda Mandal 3 / Sukta 34 / Mantra 8

62 Sukta
11 Mantra
3/34/8
Devata- इन्द्र: Rishi- गोपवन आत्रेयः सप्तवध्रिर्वा Chhanda- भुरिक्पङ्क्ति Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
स॒त्रा॒साहं॒ वरे॑ण्यं सहो॒दां स॑स॒वांसं॒ स्व॑र॒पश्च॑ दे॒वीः। स॒सान॒ यः पृ॑थि॒वीं द्यामु॒तेमामिन्द्रं॑ मद॒न्त्यनु॒ धीर॑णासः॥

स॒त्रा॒ऽसहम् । वरे॑ण्यम् । स॒हः॒ऽदाम् । स॒स॒वांस॑म् । स्वः॑ । अ॒पः । च॒ । दे॒वीः । स॒सान॑ । यः । पृ॒थि॒वीम् । द्याम् । उ॒त । इ॒माम् । इन्द्र॑म् । म॒द॒न्ति॒ । अनु॑ । धीऽर॑णासः ॥

Mantra without Swara
सत्रासाहं वरेण्यं सहोदां ससवांसं स्वरपश्च देवीः। ससान यः पृथिवीं द्यामुतेमामिन्द्रं मदन्त्यनु धीरणासः॥

सत्राऽसहम्। वरेण्यम्। सहःऽदाम्। ससवांसम्। स्वः। अपः। च। देवीः। ससान। यः। पृथिवीम्। द्याम्। उत। इमाम्। इन्द्रम्। मदन्ति। अनु। धीऽरणासः॥

Ashtak » 3 Adhyay » 2 Varga » 16 Mantra » 3

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Meaning
(यः) जो (सत्रासाहम्) सत्यों के सहनेवाले (वरेण्यम्) स्वीकार करने योग्य (सहोदाम्) बल के देने तथा (ससवांसम्) पाप और पुण्य का विभाग करनेवाले (स्वः) सुख (च) और (देवीः) उत्तम (अपः) प्राणों को (इमाम्) प्रत्यक्ष वर्त्तमान इस (पृथिवीम्) अन्तरिक्ष वा पृथिवी (उत) और इस (द्याम्) बिजुली को (ससान) अलग-अलग करै उस (इन्द्रम्) तेजस्वी पुरुष को (धीरणासः) उत्तम बुद्धि और संग्राम से युक्त लोग (मदन्ति) आनन्दित करते हैं, वह उनके (अनु) पीछे आनन्द को प्राप्त होवें ॥८॥
Essence
जो असत्य का त्याग और सत्य का ग्रहण करने बल को बढ़ाने और प्रजा के सुख की इच्छा करनेवाला पुरुष बिजुली और पृथिवी आदि के गुणों का विद्या से विभागकर्त्ता हो, उसी परीक्षा करनेवाले जन को बुद्धिमान् वीर लोग प्राप्त होके आनन्द करते हैं और वे भी ऐसे ही पुरुष से आनन्द को प्राप्त हो सकते हैं ॥८॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं।

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