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Rigveda Mandal 3 / Sukta 34 / Mantra 7

62 Sukta
11 Mantra
3/34/7
Devata- इन्द्र: Rishi- गोपवन आत्रेयः सप्तवध्रिर्वा Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
यु॒धेन्द्रो॑ म॒ह्ना वरि॑वश्चकार दे॒वेभ्यः॒ सत्प॑तिश्चर्षणि॒प्राः। वि॒वस्व॑तः॒ सद॑ने अस्य॒ तानि॒ विप्रा॑ उ॒क्थेभिः॑ क॒वयो॑ गृणन्ति॥

यु॒धा । इन्द्रः॑ । म॒ह्ना । वरि॑वः । च॒का॒र॒ । दे॒वेभ्यः॑ । सत्ऽप॑तिः । च॒र्ष॒णि॒ऽप्राः । वि॒वस्व॑तः । सद॑ने । अ॒स्य॒ । तानि॑ । विप्राः॑ । उ॒क्थेभिः॑ । क॒वयः॑ । गृ॒ण॒न्ति॒ ॥

Mantra without Swara
युधेन्द्रो मह्ना वरिवश्चकार देवेभ्यः सत्पतिश्चर्षणिप्राः। विवस्वतः सदने अस्य तानि विप्रा उक्थेभिः कवयो गृणन्ति॥

युधा। इन्द्रः। मह्ना। वरिवः। चकार। देवेभ्यः। सत्ऽपतिः। चर्षणिऽप्राः। विवस्वतः। सदने। अस्य। तानि। विप्राः। उक्थेभिः। कवयः। गृणन्ति॥

Ashtak » 3 Adhyay » 2 Varga » 16 Mantra » 2

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1 Bhashyas
Meaning
जो (देवेभ्यः) विद्वानों से शिक्षा पाके (सत्पतिः) श्रेष्ठ पुरुषों का पालन करने (चर्षणिप्राः) मनुष्यों को सत्य विद्या शिक्षा और उत्तम स्वभाव से पूर्ण करनेवाला (इन्द्रः) राज्य के ऐश्वर्य से युक्त (मह्ना) बड़े (युधा) संग्राम से जिन कर्मों का (वरिवः) सेवन (चकार) करै उस (अस्य) इस राजपुरुष के (तानि) उन कर्मों की (विवस्वतः) सूर्य्य के (सदने) मण्डल में (कवयः) विद्यायुक्त (विप्राः) बुद्धिमान् लोग (उक्थेभिः) प्रशंसा के वचनों से (गृणन्ति) स्तुति करते हैं ॥७॥
Essence
उन्हीं लोगों को विद्वान् और धार्मिक जानना चाहिये कि जो राजा आदिकों की झूठी स्तुति को त्याग के धर्मसम्बन्धी कर्मों की प्रशंसा करते हैं और वे ही राजा होने के योग्य हैं कि जो धर्मयुक्त आचरणों को करते हैं ॥७॥
Subject
फिर विद्वान् तथा राजपुरुष के विषय को अगले मन्त्र में कहा है।