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Rigveda Mandal 3 / Sukta 34 / Mantra 6

62 Sukta
11 Mantra
3/34/6
Devata- इन्द्र: Rishi- गोपवन आत्रेयः सप्तवध्रिर्वा Chhanda- भुरिक्पङ्क्ति Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
म॒हो म॒हानि॑ पनयन्त्य॒स्येन्द्र॑स्य॒ कर्म॒ सुकृ॑ता पु॒रूणि॑। वृ॒जने॑न वृजि॒नान्त्सं पि॑पेष मा॒याभि॒र्दस्यूँ॑र॒भिभू॑त्योजाः॥

म॒हः । म॒हानि॑ । प॒न॒य॒न्ति॒ । अ॒स्य॒ । इन्द्र॑स्य । कर्म॑ । सुऽकृ॑ता । पु॒रूणि॑ । वृ॒जने॑न । वृ॒जि॒नान् । सम् । पि॒पे॒ष॒ । मा॒याभिः॑ । दस्यू॑ँन् । अ॒भिभू॑तिऽओजाः ॥

Mantra without Swara
महो महानि पनयन्त्यस्येन्द्रस्य कर्म सुकृता पुरूणि। वृजनेन वृजिनान्त्सं पिपेष मायाभिर्दस्यूँरभिभूत्योजाः॥

महः। महानि। पनयन्ति। अस्य। इन्द्रस्य। कर्म। सुऽकृता। पुरूणि। वृजनेन। वृजिनान्। सम्। पिपेष। मायाभिः। दस्यून्। अभिभूतिऽओजाः॥

Ashtak » 3 Adhyay » 2 Varga » 16 Mantra » 1

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1 Bhashyas
Meaning
जो (अभिभूत्योजाः) शत्रुपराजय करनेवाले बल से युक्त राजपुरुष (वृजनेन) बल और (मायाभिः) बुद्धियों से (वृजिनान्) पापी (दस्यून्) साहसी चोरों को (सम्) (पिपेष) पीसै और जो (अस्य) इस (महः) श्रेष्ठ (इन्द्रस्य) सम्पूर्ण ऐश्वर्ययुक्त पुरुष के (पुरूणि) बहुत (महानि) बड़े (सुकृता) उत्तम धर्म के योग से किये गये (कर्म) कार्य्यों की (पनयन्ति) प्रशंसा करते हैं, उनका ग्रहण करै, वही पुरुष राजा का मन्त्री होने योग्य होवे ॥६॥
Essence
जैसे राजा और प्रजाजनों को सब लोगों के स्वामी के धर्मयुक्त कर्म स्वीकार करने योग्य हैं, वैसे ही सबके स्वामी राजा को चाहिये कि सब लोगों के उत्तम आचरणों का स्वीकार करै और अनिष्ट आचरणों का स्वीकार कोई न करैं ॥६॥
Subject
फिर राजा तथा प्रजाजनों के कर्त्तव्य विषय को कहते हैं।