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Rigveda Mandal 3 / Sukta 34 / Mantra 2

62 Sukta
11 Mantra
3/34/2
Devata- इन्द्र: Rishi- गोपवन आत्रेयः सप्तवध्रिर्वा Chhanda- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
म॒खस्य॑ ते तवि॒षस्य॒ प्र जू॒तिमिय॑र्मि॒ वाच॑म॒मृता॑य॒ भूष॑न्। इन्द्र॑ क्षिती॒नाम॑सि॒ मानु॑षीणां वि॒शां दैवी॑नामु॒त पू॑र्व॒यावा॑॥

म॒खस्य॑ । ते॒ । त॒वि॒षस्य॑ । प्र । जू॒तिम् । इय॑र्मि । वाच॑म् । अ॒मृता॑य । भूष॑न् । इन्द्र॑ । क्षि॒ती॒नाम् । अ॒सि॒ । मानु॑षीणाम् । वि॒शाम् । दैवी॑नाम् । उ॒त । पू॒र्व॒ऽयावा॑ ॥

Mantra without Swara
मखस्य ते तविषस्य प्र जूतिमियर्मि वाचममृताय भूषन्। इन्द्र क्षितीनामसि मानुषीणां विशां दैवीनामुत पूर्वयावा॥

मखस्य। ते। तविषस्य। प्र। जूतिम्। इयर्मि। वाचम्। अमृताय। भूषन्। इन्द्र। क्षितीनाम्। असि। मानुषीणाम्। विशाम्। दैवीनाम्। उत। पूर्वऽयावा॥

Ashtak » 3 Adhyay » 2 Varga » 15 Mantra » 2

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Meaning
हे (इन्द्र) अत्यन्त ऐश्वर्य के देनेवाले ! (ते) आपके (मखस्य) मेल करने रूप व्यवहार और (तविषस्य) बल के (जूतिम्) वेग और (अमृताय) अविनाशि सुख के लिये (वाचम्) कही हुई सत्य वाणी को (भूषन्) शोभित करता हुआ मैं (प्र, इयर्मि) प्राप्त होता हूँ, जिससे आप (दैवीनाम्) उत्तम गुणों से युक्त (क्षितीनाम्) अपने राज्य में बसनेवाली (मानुषीणाम्) मनुष्यरूप (विशाम्) प्रजाओं की (पूर्वयावा) प्राचीन राजनीति को प्राप्त (उत) अथवा अपने ही से विद्या और विनय से युक्त हो, इससे श्रेष्ठ पुरुषों से सत्कार करने योग्य (असि) हो ॥२॥
Essence
सम्पूर्ण प्रजा और राजजनों को चाहिये कि सब लोगों के स्वामी की आज्ञा का उल्लङ्घन न करैं और सब लोगों के स्वामी को चाहिये कि धर्मयुक्त कर्मों से निरन्तर प्रजाओं का पालन करैं ॥२॥
Subject
अब राजा प्रजा सम्बन्धी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं।

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