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Rigveda Mandal 3 / Sukta 34 / Mantra 10

62 Sukta
11 Mantra
3/34/10
Devata- इन्द्र: Rishi- गोपवन आत्रेयः सप्तवध्रिर्वा Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
इन्द्र॒ ओष॑धीरसनो॒दहा॑नि॒ वन॒स्पतीँ॑रसनोद॒न्तरि॑क्षम्। बि॒भेद॑ ब॒लं नु॑नु॒दे विवा॒चोऽथा॑भवद्दमि॒ताभिक्र॑तूनाम्॥

इन्द्रः॑ । ओष॑धीः । अ॒स॒नो॒त् । अहा॑नि । व॒न॒स्पती॑न् । अ॒स॒नो॒त् । अ॒न्तरि॑क्षम् । बि॒भेद॑ । व॒लम् । नु॒नु॒दे । विऽवा॑चः । अथ॑ । अ॒भ॒व॒त् । द॒मि॒ता । अ॒भिऽक्र॑तूनाम् ॥

Mantra without Swara
इन्द्र ओषधीरसनोदहानि वनस्पतीँरसनोदन्तरिक्षम्। बिभेद बलं नुनुदे विवाचोऽथाभवद्दमिताभिक्रतूनाम्॥

इन्द्रः। ओषधीः। असनोत्। अहानि। वनस्पतीन्। असनोत्। अन्तरिक्षम्। बिभेद। बलम्। नुनुदे। विऽवाचः। अथ। अभवत्। दमिता। अभिऽक्रतूनाम्॥

Ashtak » 3 Adhyay » 2 Varga » 16 Mantra » 5

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1 Bhashyas
Meaning
वह (इन्द्रः) ऐश्वर्य्य देनेवाला राजा (अहानि) दिनों दिन (ओषधीः) सोम आदि ओषधियों को (असनोत्) देवै (वनस्पतीन्) पीपल आदि वनस्पतियों को (असनोत्) देवै (अन्तरिक्षम्) जल और (बलम्) बल का (बिभेद) भेदन करै (विवाचः) अनेक प्रकार की वाणियों की (नुनुदे) प्रेरणा करै (अथ) और भी (अभिक्रतूनाम्) सहसा शीघ्र कर्म करनेवाले शत्रुओं को (दमिता) दमन करनेवाला (अभवत्) होवै ॥१०॥
Essence
राजा आदि श्रेष्ठ जनों को चाहिये कि प्रतिदिन ओषधियों के रसादि उत्पन्न कर उनके रस का पान विद्यासम्बन्धी वाणी का प्रचार और सब जनों की बुद्धियों का अपनी बुद्धि से भी अधिकता के सहित दमन अर्थात् विषयों से निवृत्ति करैं, जिससे आरोग्य और विद्याओं के प्रभाव प्रतिदिन बढ़ैं ॥१०॥
Subject
फिर राजादि जनों को क्या करना चाहिये, इस विषय को अगले मन्त्र में कहा है।