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Rigveda Mandal 3 / Sukta 33 / Mantra 9

62 Sukta
13 Mantra
3/33/9
Devata- नद्यः Rishi- गोपवन आत्रेयः सप्तवध्रिर्वा Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
ओ षु स्व॑सारः का॒रवे॑ शृणोत य॒यौ वो॑ दू॒रादन॑सा॒ रथे॑न। नि षू न॑मध्वं॒ भव॑ता सुपा॒रा अ॑धोअ॒क्षाः सि॑न्धवः स्रो॒त्याभिः॑॥

ओ इति॑ । सु । स्व॒सा॒रः॒ । का॒रवे॑ । शृ॒णो॒त॒ । य॒यौ । वः॒ । दू॒रात् । अन॑सा । रथे॑न । नि । सु । न॒म॒ध्व॒म् । भव॑त । सु॒ऽपा॒राः । अ॒धः॒ऽअ॒क्षाः । सि॒न्ध॒वः॒ । स्रो॒त्याभिः॑ ॥

Mantra without Swara
ओ षु स्वसारः कारवे शृणोत ययौ वो दूरादनसा रथेन। नि षू नमध्वं भवता सुपारा अधोअक्षाः सिन्धवः स्रोत्याभिः॥

ओ इति। सु। स्वसारः। कारवे। शृणोत। ययौ। वः। दूरात्। अनसा। रथेन। नि। सु। नमध्वम्। भवत। सुऽपाराः। अधःऽअक्षाः। सिन्धवः। स्रोत्याभिः॥

Ashtak » 3 Adhyay » 2 Varga » 13 Mantra » 4

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Meaning
(ओ) हे विद्वान् पुरुषो ! आप लोग (कारवे) शिल्पीजन के लिये (स्वसारः) भगिनी के तुल्य वर्त्तमान अङ्गुलियों (स्रोत्याभिः) वा स्रोतों में होनेवाली गतियों से (सिन्धवः) नदियों के समान (अधोअक्षाः) नीचे को प्राप्त होती हुईं इन्द्रियों से युक्त (सुपाराः) सुन्दर पालन आदि कर्म करनेवाले (सु) (भवत) उत्तम प्रकार से हूजिये जो (अनसा) शकट और (रथेन) रथ से (दूरात्) दूर (वः) आप लोगों को (ययौ) प्राप्त होता है उसको (सु, शृणोत) उत्तम प्रकार सुनिये उसमें (नि) अत्यन्त (नमध्वम्) नम्र हूजिये ॥९॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो लोग दूसरे-दूसरे में प्रसन्न बहुत बातों को सुने हुए पुरुष, औरों से बनाए हुए शीघ्र चलनेवाले वाहनों को देख और वैसे ही बनाय के जलाशयों के आर-पार जाते हुए नम्र होवें, उनको जैसे स्रोता नदियों को, वैसे ऐश्वर्य्य गुण प्राप्त होते हैं ॥९॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं।

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