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Rigveda Mandal 3 / Sukta 33 / Mantra 7

62 Sukta
13 Mantra
3/33/7
Devata- नद्यः Rishi- गोपवन आत्रेयः सप्तवध्रिर्वा Chhanda- पङ्क्तिः Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
प्र॒वाच्यं॑ शश्व॒धा वी॒र्यं१॒॑ तदिन्द्र॑स्य॒ कर्म॒ यदहिं॑ विवृ॒श्चत्। वि वज्रे॑ण परि॒षदो॑ जघा॒नाय॒न्नापोऽय॑नमि॒च्छमा॑नाः॥

प्र॒ऽवाच्य॑म् । श॒श्व॒धा । वी॒र्य॑म् । तत् । इन्द्र॑स्य । कर्म॑ । यत् । अहि॑म् । वि॒ऽवृ॒श्चत् । वि । वज्रे॑ण । प॒रि॒ऽषदः॑ । ज॒घा॒न॒ । आय॑न् । आपः॑ । अय॑नम् । इ॒च्छमा॑नाः ॥

Mantra without Swara
प्रवाच्यं शश्वधा वीर्यं१ तदिन्द्रस्य कर्म यदहिं विवृश्चत्। वि वज्रेण परिषदो जघानायन्नापोऽयनमिच्छमानाः॥

प्रऽवाच्यम्। शश्वधा। वीर्यम्। तत्। इन्द्रस्य। कर्म। यत्। अहिम्। विऽवृश्चत्। वि। वज्रेण। परिऽषदः। जघान। आयन्। आपः। अयनम्। इच्छमानाः॥

Ashtak » 3 Adhyay » 2 Varga » 13 Mantra » 2

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Meaning
हे मनुष्यो ! जो सूर्य्य (अहिम्) मेघ को (विवृश्चत्) काटता है (यत्) जो (इन्द्रस्य) सूर्य्य का (वीर्य्यम्) बलरूप (कर्म) कर्म है (तत्) वह (शश्वधा) निरन्तर हो (प्रवाच्यम्) कहने योग्य और जैसे (वज्रेण) किरण से विदीर्ण किये गये मेघ के (आपः) जल (अयनम्) भूमि स्थान को (आयन्) प्राप्त होवैं मेघ को (विजघान) नाश करता है वैसे ही (इच्छमानाः) इच्छा करते हुए जन (परिषदः) जिनमें बैठें, उन सभा को करैं ॥७॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे मनुष्यो ! जो धर्मसम्बन्धी काम करके दुष्ट पुरुषों के निवारण के लिये अपना पराक्रम दिखावे, उसके उस कर्म की प्रशंसा सब काल में करनी चाहिये। जो लोग सभा में श्रेष्ठ होवें, वे न्याय से सब लोगों की उन्नति करने की इच्छा करें ॥७॥
Subject
फिर मनुष्य क्या करे, इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं।

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