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Rigveda Mandal 3 / Sukta 33 / Mantra 6

62 Sukta
13 Mantra
3/33/6
Devata- नद्यः Rishi- गोपवन आत्रेयः सप्तवध्रिर्वा Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
इन्द्रो॑ अ॒स्माँ अ॑रद॒द्वज्र॑बाहु॒रपा॑हन्वृ॒त्रं प॑रि॒धिं न॒दीना॑म्। दे॒वो॑ऽनयत्सवि॒ता सु॑पा॒णिस्तस्य॑ व॒यं प्र॑स॒वे या॑म उ॒र्वीः॥

इन्द्रः॑ । अ॒स्मान् । अ॒र॒द॒त् । वज्र॑ऽबाहुः । अप॑ । अ॒ह॒न् । वृ॒त्रम् । प॒रि॒ऽधिम् । न॒दीना॑म् । दे॒वः॑ । अ॒न॒य॒त् । स॒वि॒ता । सु॒ऽपा॒णिः । तस्य॑ । व॒यम् । प्र॒ऽस॒वे । या॒मः॒ । उ॒र्वीः ॥

Mantra without Swara
इन्द्रो अस्माँ अरदद्वज्रबाहुरपाहन्वृत्रं परिधिं नदीनाम्। देवोऽनयत्सविता सुपाणिस्तस्य वयं प्रसवे याम उर्वीः॥

इन्द्रः। अस्मान्। अरदत्। वज्रऽबाहुः। अप। अहन्। वृत्रम्। परिऽधिम्। नदीनाम्। देवः। अनयत्। सविता। सुऽपाणिः। तस्य। वयम्। प्रऽसवे। यामः। उर्वीः॥

Ashtak » 3 Adhyay » 2 Varga » 13 Mantra » 1

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Meaning
हे राजन् (इन्द्रः) अत्यन्त ऐश्वर्य्यवान् ! आप जैसे (सविता) सूर्य (देवः) उत्तम गुण कर्म और स्वभावयुक्त (नदीनाम्) नदियों के (परिधिम्) चारों ओर वर्त्तमान (वृत्रम्) ढाँपनेवाले मेघ को (अप) (अहन्) नाश करता है उसके अवयवों को (अरदत्) खोदै और जल, भूमि को (अनयत्) प्राप्त करता वैसे (वज्रबाहुः) शस्त्रधारी हो (अस्मान्) हम लोगों की रक्षा करके सेवकों के सहित शत्रुओं का नाश करें जो (सुपाणिः) उत्तम हाथों से और उत्तम गुण कर्म स्वभाव से युक्त आप (उर्वीः) बहुत सुख की देनेवाली प्रजाओं की रक्षा करें (तस्य) उसके (प्रसवे) ऐश्वर्य्य में (वयम्) हम लोग आनन्द को (यामः) प्राप्त होवें ॥६॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे सूर्य भूमि आदि पदार्थों को आकर्षण से यथास्थान ठहरा और वृष्टि करके ऐश्वर्य को उत्पन्न करता है, वैसे ही हम लोग उत्तम गुणों का आकर्षण और शत्रुओं को जीत करके राज्य की शोभा को प्राप्त करें ॥६॥
Subject
अब सूर्य के दृष्टान्त से मनुष्य के कर्त्तव्य को कहते हैं।

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