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Rigveda Mandal 3 / Sukta 33 / Mantra 5

62 Sukta
13 Mantra
3/33/5
Devata- नद्यः Rishi- गोपवन आत्रेयः सप्तवध्रिर्वा Chhanda- स्वराट्पङ्क्ति Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
रम॑ध्वं मे॒ वच॑से सो॒म्याय॒ ऋता॑वरी॒रुप॑ मुहू॒र्तमेवैः॑। प्र सिन्धु॒मच्छा॑ बृह॒ती म॑नी॒षाव॒स्युर॑ह्वे कुशि॒कस्य॑ सू॒नुः॥

रम॑ध्वम् । मे॒ । वच॑से । सो॒म्याय॑ । ऋत॑ऽवरीः । उप॑ । मु॒हू॒र्तम् । एवैः॑ । प्र । सिन्धु॑म् । अच्छ॑ । बृ॒ह॒ती । म॒नी॒षा । अ॒व॒स्युः । अ॒ह्ने॒ । कु॒शि॒कस्य॑ । सू॒नुः ॥

Mantra without Swara
रमध्वं मे वचसे सोम्याय ऋतावरीरुप मुहूर्तमेवैः। प्र सिन्धुमच्छा बृहती मनीषावस्युरह्वे कुशिकस्य सूनुः॥

रमध्वम्। मे। वचसे। सोम्याय। ऋतऽवरीः। उप। मुहूर्तम्। एवैः। प्र। सिन्धुम्। अच्छ। बृहती। मनीषा। अवस्युः। अह्वे। कुशिकस्य। सूनुः॥

Ashtak » 3 Adhyay » 2 Varga » 12 Mantra » 5

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1 Bhashyas
Meaning
हे मनुष्यो ! आप लोग जैसे (ऋतावरीः) बहुत जलों से युक्त नदी (सिन्धुम्) समुद्र को (उप) प्राप्त और स्थिर होती हैं वैसे ही (एवैः) प्राप्त करानेवाले गुणों से (मुहूर्त्तम्) दो-दो घड़ी (मे) मेरे (सोम्याय) चन्द्रमा के तुल्य शान्ति गुणयुक्त (वचसे) वचन के लिये (रमध्वम्) क्रीड़ा करो वैसे ही (कुशिकस्य) विद्या के निचोड़ को प्राप्त हुए सज्जन के (सूनुः) पुत्र के सदृश वर्त्तमान (अवस्युः) अपने को रक्षा चाहनेवाला मैं जो (बृहती) बड़ी (मनीषा) बुद्धि उसकी (अच्छ) उत्तम प्रकार (प्र) (अह्वे) प्रशंसा करता हूँ ॥५॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे नदियाँ समुद्र के सम्मुख जाती हैं, वैसे ही मनुष्य लोग विद्या और धर्मसम्बन्धी व्यवहार को प्राप्त हों, जिससे सुखपूर्वक समय व्यतीत होवै ॥५॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं।