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Rigveda Mandal 3 / Sukta 33 / Mantra 3

62 Sukta
13 Mantra
3/33/3
Devata- नद्यः Rishi- गोपवन आत्रेयः सप्तवध्रिर्वा Chhanda- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
अच्छा॒ सिन्धुं॑ मा॒तृत॑मामयासं॒ विपा॑शमु॒र्वीं सु॒भगा॑मगन्म। व॒त्समि॑व मा॒तरा॑ संरिहा॒णे स॑मा॒नं योनि॒मनु॑ सं॒चर॑न्ती॥

अच्छ॑ । सिन्धु॑म् । मा॒तृऽत॑माम् । अ॒या॒स॒म् । विपा॑शम् । उ॒र्वीम् । सु॒ऽभगा॑म् । अ॒ग॒न्म॒ । व॒त्सम्ऽइ॑व । मा॒तरा॑ । सं॒रि॒हा॒णे इति॑ स॒म्ऽरि॒हा॒णे । स॒मा॒नम् । योनि॑म् । अनु॑ । स॒म्ऽचर॑न्ती ॥

Mantra without Swara
अच्छा सिन्धुं मातृतमामयासं विपाशमुर्वीं सुभगामगन्म। वत्समिव मातरा संरिहाणे समानं योनिमनु संचरन्ती॥

अच्छ। सिन्धुम्। मातृऽतमाम्। अयासम्। विपाशम्। उर्वीम्। सुऽभगाम्। अगन्म। वत्सम्ऽइव। मातरा। संरिहाणे इति सम्ऽरिहाणे। समानम्। योनिम्। अनु। सम्ऽचरन्ती॥

Ashtak » 3 Adhyay » 2 Varga » 12 Mantra » 3

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1 Bhashyas
Meaning
जैसे (मातृतमाम्) अत्यन्त माता के सदृश पालन करनेवाली नदियाँ (सिन्धुम्) समुद्र के प्रति प्राप्त होती हैं वैसे ही हम (विपाशम्) बन्धनरहित (उर्वीम्) बड़ी (सुभगाम्) सौभाग्य से युक्त पढ़ाने और उपदेश देनेवाली स्त्री को (अगन्म) प्राप्त हों और जैसे (संरिहाणे) उत्तम प्रकार आस्वाद करनेवाली स्त्रियाँ (समानम्) तुल्य (योनिम्) गृह को (अनु) (सञ्चरन्ती) अनुकूलता से उत्तम प्रकार चलतीं और जानती हुईं (मातरा) माता के सदृश वर्त्तमान (वत्समिव) जैसे गौ बछड़े को वैसे मुझको पढ़ाने और शिक्षा देने के लिये प्राप्त होवें उनको मैं (अच्छ, अयासम्) अच्छे प्रकार प्राप्त होऊँ ॥३॥
Essence
इस मन्त्र में उपमा और वाचकलुप्तोपमालङ्कार हैं। जैसे समुद्र को नदियाँ और बछड़ों को गौवें और स्त्री पुरुष एक गृह को प्राप्त होते हैं, वैसे ही पढ़ाने और उपदेश देनेवाली स्त्रियाँ हम लोगों को प्राप्त हों और हम लोग जो कन्या और सौभाग्यवाली स्त्रियाँ हों, उनको प्राप्त हों ॥३॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं।