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Rigveda Mandal 3 / Sukta 33 / Mantra 2

62 Sukta
13 Mantra
3/33/2
Devata- नद्यः Rishi- गोपवन आत्रेयः सप्तवध्रिर्वा Chhanda- विराट्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
इन्द्रे॑षिते प्रस॒वं भिक्ष॑माणे॒ अच्छा॑ समु॒द्रं र॒थ्ये॑व याथः। स॒मा॒रा॒णे ऊ॒र्मिभिः॒ पिन्व॑माने अ॒न्या वा॑म॒न्यामप्ये॑ति शुभ्रे॥

इन्द्रे॑षिते॒ इतीन्द्र॑ऽइषिते । प्र॒ऽस॒वम् । भिक्ष॑माणे॒ इति॑ । अच्छ॑ । स॒मु॒द्रम् । र॒थ्या॑ऽइव । या॒थः॒ । स॒मा॒रा॒णे इति॑ स॒म्ऽआ॒रा॒णे । ऊ॒र्मिऽभिः॑ । पिन्व॑माने॒ इति॑ । अ॒न्या । वा॒म् । अ॒न्याम् । अपि॑ । ए॒ति॒ । शु॒भ्रे॒ इति॑ ॥

Mantra without Swara
इन्द्रेषिते प्रसवं भिक्षमाणे अच्छा समुद्रं रथ्येव याथः। समाराणे ऊर्मिभिः पिन्वमाने अन्या वामन्यामप्येति शुभ्रे॥

इन्द्रेषिते इतीन्द्रऽइषिते। प्रऽसवम्। भिक्षमाणे इति। अच्छ। समुद्रम्। रथ्याऽइव। याथः। समाराणे इति सम्ऽआराणे। ऊर्मिऽभिः। पिन्वमाने इति। अन्या। वाम्। अन्याम्। अपि। एति। शुभ्रे इति॥

Ashtak » 3 Adhyay » 2 Varga » 12 Mantra » 2

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1 Bhashyas
Meaning
हे मनुष्यो ! जो (इन्द्रेषिते) सूर्य्य से वृष्टि के द्वारा प्रेरित की गईं (पिन्वमाने) सींचनेवाली (ऊर्भिभिः) तरङ्गों से (समुद्रम्) बहनेवाले जलों से युक्त मेघ वा सागर को (रथ्येव) रथों में चलने योग्य घोड़ों वा नदियों के सदृश (प्रसवम्) उत्तम ऐश्वर्य्य की (भिक्षमाणे) याचना करती हुईं (समाराणे) उत्तम प्रकार सब तरह दान देनेवाली (शुभ्रे) शोभायुक्त होकर पढ़ाने और उपदेश करनेवाली स्त्रियाँ (अच्छ, याथः) अच्छे प्रकार जावें (अन्या) कोई एक स्त्री (अन्याम्) दूसरी स्त्री को (अपि) (एति) प्रीति से मिलाती है वा हे पढ़ाने और उपदेश देनेवालियो ! (वाम्) तुम दोनों के सम्बन्ध से जो स्त्रियाँ पढ़ने वा सुनने को प्राप्त हों, वे स्त्रियाँ तुमको विद्यासम्बन्धी व्यवहार में नियुक्त करनी तथा पढ़ानी चाहियें ॥२॥
Essence
इस मन्त्र में उपमा और वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे जवान स्त्रियाँ जवान पतियों को प्राप्त होके गर्भोत्पत्ति की इच्छा करती हैं और नदियाँ समुद्र के प्रति जाती हैं और घोड़े मार्ग में रथ को ले चलते हैं, वैसे ही पढ़ने और उपदेश देनेवालियों को चाहिये कि विद्या और उत्तम शिक्षा के दान से सम्पूर्ण स्त्रियों को उत्तम गुणकर्म स्वभावयुक्त करें ॥२॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं।