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Rigveda Mandal 3 / Sukta 33 / Mantra 13

62 Sukta
13 Mantra
3/33/13
Devata- नद्यः Rishi- गोपवन आत्रेयः सप्तवध्रिर्वा Chhanda- उष्णिक् Swara- ऋषभः
Mantra with Swara
उद्व॑ ऊ॒र्मिः शम्या॑ ह॒न्त्वापो॒ योक्त्रा॑णि मुञ्चत। मादु॑ष्कृतौ॒ व्ये॑नसा॒ऽघ्न्यौ शून॒मार॑ताम्॥

उत् । वः॒ । ऊ॒र्मिः । शम्याः॑ । ह॒न्तु॒ । आपः॑ । योक्त्रा॑णि । मु॒ञ्च॒त॒ । मा । अदुः॑ऽकृतौ । विऽए॑नसा । अ॒घ्न्यौ । शून॑म् । आ । अ॒र॒ता॒म् ॥

Mantra without Swara
उद्व ऊर्मिः शम्या हन्त्वापो योक्त्राणि मुञ्चत। मादुष्कृतौ व्येनसाऽघ्न्यौ शूनमारताम्॥

उत्। वः। ऊर्मिः। शम्याः। हन्तु। आपः। योक्त्राणि। मुञ्चत। मा। अदुःऽकृतौ। विऽएनसा। अघ्न्यौ। शूनम्। आ। अरताम्॥

Ashtak » 3 Adhyay » 2 Varga » 14 Mantra » 3

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1 Bhashyas
Meaning
हे स्त्रियो ! आप (शम्याः) कर्म में उत्पन्न (आपः) जलों के सदृश दुःख को (हन्तु) दूर करैं और (वः) आपका जो (ऊर्मिः) तरंग के सदृश उत्साह उससे (योक्त्राणि) जोड़नों को तुम (मुञ्चत) त्याग करो हे स्त्री और पुरुष ! तुम दोनों (अदुष्कृतौ) दुष्टाचरण से रहित हुए दुष्ट कर्म को (मा) नहीं प्राप्त होओ (व्येनसा) पाप का आचरण नष्ट होने से (अघ्न्यौ) नहीं मारने योग्य होते हुए पति और स्त्री दोनों (शूनम्) सुख को (उत्) उत्तम प्रकार (आ) (अरताम्) प्राप्त होवैं ॥१३॥
Essence
जो स्त्री और पुरुष दुःख के बन्धनों को काट और दुष्ट आचरण को त्याग के विद्या की उन्नति करें, तो वे निरन्तर सुख को प्राप्त होवैं ॥१३॥ इस सूक्त में मेघ, नदी, विद्वान्, मित्र, शिल्पी, नौका आदि स्त्री पुरुष का कृत्य वर्णन करने से इस सूक्त के अर्थ की पूर्वसूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये ॥ यह तेतीसवाँ सूक्त और चौदहवाँ वर्ग समाप्त हुआ ॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं।