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Rigveda Mandal 3 / Sukta 33 / Mantra 12

62 Sukta
13 Mantra
3/33/12
Devata- नद्यः Rishi- गोपवन आत्रेयः सप्तवध्रिर्वा Chhanda- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
अता॑रिषुर्भर॒ता ग॒व्यवः॒ समभ॑क्त॒ विप्रः॑ सुम॒तिं न॒दीना॑म्। प्र पि॑न्वध्वमि॒षय॑न्तीः सु॒राधा॒ आ व॒क्षणाः॑ पृ॒णध्वं॑ या॒त शीभ॑म्॥

अता॑रिषुः । भ॒र॒ताः । ग॒व्यवः॑ । सम् । अभ॑क्त । विप्रः॑ । सु॒ऽम॒तिम् । न॒दीना॑म् । प्र । पि॒न्व॒ध्व॒म् । इ॒षय॑न्तीः । सु॒ऽराधा॑ । आ । व॒क्षणाः॑ । पृ॒णध्व॑म् । या॒त । शीभ॑म् ॥

Mantra without Swara
अतारिषुर्भरता गव्यवः समभक्त विप्रः सुमतिं नदीनाम्। प्र पिन्वध्वमिषयन्तीः सुराधा आ वक्षणाः पृणध्वं यात शीभम्॥

अतारिषुः। भरताः। गव्यवः। सम्। अभक्त। विप्रः। सुऽमतिम्। नदीनाम्। प्र। पिन्वध्वम्। इषयन्तीः। सुऽराधा। आ। वक्षणाः। पृणध्वम्। यात। शीभम्॥

Ashtak » 3 Adhyay » 2 Varga » 14 Mantra » 2

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Meaning
हे मनुष्यो ! जैसे (गव्यवः) अपनी उत्तम शिक्षायुक्त वाणी की इच्छा करने तथा (भरताः) धारण और पोषण करनेवाले नौका आदि से (नदीनाम्) नदियों के सदृश वर्त्तमान पढ़ी हुई स्त्रियों के ज्ञानप्रवाहों को (अतारिषुः) तरैं, जैसे (सुराधाः) उत्तम धनयुक्त (विप्रः) बुद्धिमान् पुरुष (सुमतिम्) उत्तम बुद्धि को (सम्, अभक्त) अच्छे प्रकार सेवन करे और जैसे (वक्षणाः) बहती हुईं नदियाँ और बहती हैं वैसे (इषयन्तीः) अन्न को सिद्ध करनेवाली स्त्रियों को (प्र, पिन्वध्वम्) सेवन करो, सबका (आ) (पृणध्वम्) पालन करो और उत्तम गुणों को (शीभम्) शीघ्र (यात) प्राप्त होओ ॥१२॥
Essence
मनुष्यों को चाहिये कि नदी और समुद्र आदि जलाशयों को विद्वानों के सदृश पार होके सुख का शीघ्र सेवन करें ॥१२॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं।

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