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Rigveda Mandal 3 / Sukta 33 / Mantra 10

62 Sukta
13 Mantra
3/33/10
Devata- नद्यः Rishi- गोपवन आत्रेयः सप्तवध्रिर्वा Chhanda- विराट्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
आ ते॑ कारो शृणवामा॒ वचां॑सि य॒याथ॑ दू॒रादन॑सा॒ रथे॑न। नि ते॑ नंसै पीप्या॒नेव॒ योषा॒ मर्या॑येव क॒न्या॑ शश्व॒चै ते॑॥

आ । ते॒ । का॒रो॒ इति॑ । शृ॒ण॒वा॒म॒ । वचां॑सि । य॒याथ॑ । दू॒रात् । अन॑सा । रथे॑न । नि । ते॒ । नं॒सै॒ । पी॒प्या॒नाऽइ॑व । योषा॑ । मर्या॑यऽइव । क॒न्या॑ । श॒श्व॒चै । त॒ इति॑ ते ॥

Mantra without Swara
आ ते कारो शृणवामा वचांसि ययाथ दूरादनसा रथेन। नि ते नंसै पीप्यानेव योषा मर्यायेव कन्या शश्वचै ते॥

आ। ते। कारो इति। शृणवाम। वचांसि। ययाथ। दूरात्। अनसा। रथेन। नि। ते। नंसै। पीप्यानाऽइव। योषा। मर्यायऽइव। कन्या। शश्वचै। त इति ते॥

Ashtak » 3 Adhyay » 2 Varga » 13 Mantra » 5

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Meaning
हे (कारो) शिल्प विद्याओं में चतुर ! (ते) आपके (वचांसि) विद्या के प्राप्त करानेवाले वचनों को (अनसा) शकट और (रथेन) रथ से (दूरात्) दूर से आपके हम लोग (आ) सब प्रकार (शृणवाम) सुनैं ओर जैसे आप हम लोगों को (ययाथ) प्राप्त होवैं वैसे हम लोग आपको प्राप्त होवैं जो आप (पीप्यानेव) विद्या के वृद्ध दो पुरुषों के सदृश (नि, नंसै) नमस्कार करैं (ते) आपके लिये हम लोग भी नम्र होवैं (योषा) स्त्री (मर्यायेव) जैसे पुरुष के लिये और (कन्या) कन्या (शश्वचै) प्रीति से मिलने के लिये वैसे (ते) आपके लिये हम लोग अभिलाषा करैं ॥१०॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो लोग दूर से आय के विद्वानों के समीप से अनेक प्रकार की विद्याओं को प्राप्त करके नम्र होते हैं, वे विद्यावृद्ध होकर जैसे पतिव्रता स्त्री पति और कन्या अभीष्ट वर को वैसे विद्या को प्राप्त होके आनन्दित होते हैं ॥१०॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं।

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