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Rigveda Mandal 3 / Sukta 32 / Mantra 9

62 Sukta
17 Mantra
3/32/9
Devata- इन्द्र: Rishi- गोपवन आत्रेयः सप्तवध्रिर्वा Chhanda- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
अद्रो॑घ स॒त्यं तव॒ तन्म॑हि॒त्वं स॒द्यो यज्जा॒तो अपि॑बो ह॒ सोम॑म्। न द्याव॑ इन्द्र त॒वस॑स्त॒ ओजो॒ नाहा॒ न मासाः॑ श॒रदो॑ वरन्त॥

अद्रो॑घ । स॒त्यम् । तव॑ । तत् । म॒हि॒ऽत्वम् । स॒द्यः । यत् । जा॒तः । अपि॑बः । ह॒ । सोम॑म् । न । द्यावः॑ । इ॒न्द्र॒ । त॒वसः॑ । ते॒ । ओजः॑ । न । अहा॑ । न । मासाः॑ । श॒रदः॑ । व॒र॒न्त॒ ॥

Mantra without Swara
अद्रोघ सत्यं तव तन्महित्वं सद्यो यज्जातो अपिबो ह सोमम्। न द्याव इन्द्र तवसस्त ओजो नाहा न मासाः शरदो वरन्त॥

अद्रोघ। सत्यम्। तव। तत्। महिऽत्वम्। सद्यः। यत्। जातः। अपिबः। ह। सोमम्। न। द्यावः। इन्द्र। तवसः। ते। ओजः। न। अहा। न। मासाः। शरदः। वरन्त॥

Ashtak » 3 Adhyay » 2 Varga » 10 Mantra » 4

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1 Bhashyas
Meaning
हे (अद्रोघ) द्रोह से रहित (इन्द्र) अत्यन्त ऐश्वर्य्य के दाता जगदीश्वर ! (यत्) जो (सद्यः) तत्काल (जातः) प्रकट हुआ सूर्य (सोमम्) सब जगत् से रस को (अपिबः) पीता-खींचता है (तत्) वह जिन (तव) आपके (सत्यम्) सत्य (महित्वम्) महिमा को (न) नहीं उल्लङ्घन कर सकता है (ते) आपके (तवसः) बल के (ओजः) प्रभाव को न (द्यावः) प्रकाशस्वरूप लोक (न)(अहा) दिन (न)(मासाः) चैत्र आदि महीने और न (शरदः) वसन्त आदि ऋतुयें (वरन्त) धारण करती हैं (भवन्तं, ह) उन्हीं आपकी हम लोग निरन्तर सेवा करें ॥९॥
Essence
हे मनुष्यो ! जैसे परमेश्वर किसी से द्रोह नहीं करता है, वैसे आप लोग भी हूजिये। जिस परमेश्वर की सृष्टि में सूर्य्य आदि बड़े-बड़े पदार्थ विद्यमान हैं और जिसके स्वरूप वा प्रभाव के अन्त को कोई भी नहीं प्राप्त होता है, वही हम लोगों का इष्टदेव है ॥९॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं।