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Rigveda Mandal 3 / Sukta 32 / Mantra 8

62 Sukta
17 Mantra
3/32/8
Devata- इन्द्र: Rishi- गोपवन आत्रेयः सप्तवध्रिर्वा Chhanda- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
इन्द्र॑स्य॒ कर्म॒ सुकृ॑ता पु॒रूणि॑ व्र॒तानि॑ दे॒वा न मि॑नन्ति॒ विश्वे॑। दा॒धार॒ यः पृ॑थि॒वीं द्यामु॒तेमां ज॒जान॒ सूर्य॑मु॒षसं॑ सु॒दंसाः॑॥

इन्द्र॑स्य । कर्म॑ । सुऽकृ॑ता । पु॒रूणि॑ । व्र॒तानि॑ । दे॒वाः । न । मि॒न॒न्ति॒ । विश्वे॑ । दा॒धार॑ । यः । पृ॒थि॒वीम् । द्याम् । उ॒त । इ॒माम् । ज॒जान॑ । सूर्य॑म् । उ॒षस॑म् । सु॒ऽदंसाः॑ ॥

Mantra without Swara
इन्द्रस्य कर्म सुकृता पुरूणि व्रतानि देवा न मिनन्ति विश्वे। दाधार यः पृथिवीं द्यामुतेमां जजान सूर्यमुषसं सुदंसाः॥

इन्द्रस्य। कर्म। सुऽकृता। पुरूणि। व्रतानि। देवाः। न। मिनन्ति। विश्वे। दाधार। यः। पृथिवीम्। द्याम्। उत। इमाम्। जजान। सूर्यम्। उषसम्। सुऽदंसाः॥

Ashtak » 3 Adhyay » 2 Varga » 10 Mantra » 3

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Meaning
हे मनुष्यो ! (यः) जो (सुदंसः) सुन्दर धर्म सम्बन्धी कर्मों से युक्त परमेश्वर (इमाम्) इस (पृथिवीम्) भूमि और (द्याम्) प्रकाशस्वरूप आदि लोक को तथा (सूर्यम्) सूर्य लोक को (उत) और भी (उषसम्) दिन को (जजान) उत्पन्न करता (दाधार) धारण करता वा पुष्ट करता है जिस (इन्द्रस्य) परमात्मा के (विश्वे) सम्पूर्ण (देवाः) पृथिवी आदि वा विद्वान् लोग (व्रतानि) सत्य विचारों को (सुकृता) उत्तम (पुरूणि) बहुत (कर्म) कामों को (न) नहीं (मिनन्ति) नाश करते हैं, उसकी आप और हम लोग उपासना करें ॥८॥
Essence
परमेश्वर के पवित्र होने से सम्पूर्ण सामर्थ्ययुक्त सबके उत्पन्न वा धारणकर्त्ता परमेश्वर से स्वरूप परिमित सामर्थ्य वा कर्म को कोई भी नाश नहीं कर सक्ता है और जो लोग इस परमेश्वर की सत्यभावना से उपासना करते हैं, वे भी पवित्र होकर सामर्थ्ययुक्त होते हैं ॥८॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है।

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