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Rigveda Mandal 3 / Sukta 32 / Mantra 7

62 Sukta
17 Mantra
3/32/7
Devata- इन्द्र: Rishi- गोपवन आत्रेयः सप्तवध्रिर्वा Chhanda- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
यजा॑म॒ इन्नम॑सा वृ॒द्धमिन्द्रं॑ बृ॒हन्त॑मृ॒ष्वम॒जरं॒ युवा॑नम्। यस्य॑ प्रि॒ये म॒मतु॑र्य॒ज्ञिय॑स्य॒ न रोद॑सी महि॒मानं॑ म॒माते॑॥

यजा॑मः । इत् । नम॑सा । वृ॒द्धम् । इन्द्र॑म् । बृ॒हन्त॑म् । ऋ॒ष्वम् । अ॒जर॑म् । युवा॑नम् । यस्य॑ । प्रि॒ये । म॒मतुः॑ । य॒ज्ञिय॑स्य । न । रोद॑सी॒ इति॑ । म॒हि॒मान॑म् । म॒माते॒ इति॑ ॥

Mantra without Swara
यजाम इन्नमसा वृद्धमिन्द्रं बृहन्तमृष्वमजरं युवानम्। यस्य प्रिये ममतुर्यज्ञियस्य न रोदसी महिमानं ममाते॥

यजामः। इत्। नमसा। वृद्धम्। इन्द्रम्। बृहन्तम्। ऋष्वम्। अजरम्। युवानम्। यस्य। प्रिये। ममतुः। यज्ञियस्य। न। रोदसी इति। महिमानम्। ममाते इति॥

Ashtak » 3 Adhyay » 2 Varga » 10 Mantra » 2

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1 Bhashyas
Meaning
हे मनुष्यो ! हम लोग (यस्य) जिस (यज्ञियस्य) पूजा अर्थात् प्रीति करने योग्य परमेश्वर के (महिमानम्) महत्तत्व को (रोदसी) अन्तरिक्ष और पृथिवी (न) नहीं (ममाते) नाप सकते और (प्रिये) प्रीति करानेवाले इस लोक और परलोक के सुखों ने नहीं (ममतुः) नापे हैं (इत्) उसी (युवानम्) सम्पूर्ण संसार के संयोग और विभाग के करनेवाले (अजरम्) बुढ़ापे से रहित (ऋष्वम्) श्रेष्ठ (बृहन्तम्) बढ़े (वृद्धम्) आयु को भोगे हुए वा विद्या से श्रेष्ठ (इन्द्रम्) परम ऐश्वर्य्य करनेवाले परमेश्वर की (नमसा) सत्कार से (यजाम) पूजा करते हैं, उसकी तुम लोग भी पूजा करो ॥७॥
Essence
जिस परमेश्वर की अपेक्षा कोई पदार्थ तुल्य वा अधिक नहीं, जो सब से श्रेष्ठ व्यापक विनाशरहित और पूज्य है, उसी परमात्मा की हम लोग निरन्तर उपासना करें ॥७॥
Subject
फिर कैसे ईश्वर की उपासना करनी चाहिये, इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं।