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Rigveda Mandal 3 / Sukta 32 / Mantra 6

62 Sukta
17 Mantra
3/32/6
Devata- इन्द्र: Rishi- गोपवन आत्रेयः सप्तवध्रिर्वा Chhanda- विराट्पङ्क्ति Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
त्वम॒पो यद्ध॑ वृ॒त्रं ज॑घ॒न्वाँ अत्याँ॑इव॒ प्रासृ॑जः॒ सर्त॒वाजौ। शया॑नमिन्द्र॒ चर॑ता व॒धेन॑ वव्रि॒वांसं॒ परि॑ दे॒वीरदे॑वम्॥

त्वम् । अ॒पः । यत् । ह॒ । वृ॒त्रम् । ज॒घ॒न्वान् । अत्या॑न्ऽइव । प्र । असृ॑जः । सर्त॒वै । आ॒जौ । शया॑नम् । इ॒न्द्र॒ । चर॑ता । व॒धेन॑ । व॒व्रि॒ऽवांस॑म् । परि॑ । दे॒वीः । अदे॑वम् ॥

Mantra without Swara
त्वमपो यद्ध वृत्रं जघन्वाँ अत्याँइव प्रासृजः सर्तवाजौ। शयानमिन्द्र चरता वधेन वव्रिवांसं परि देवीरदेवम्॥

त्वम्। अपः। यत्। ह। वृत्रम्। जघन्वान्। अत्यान्ऽइव। प्र। असृजः। सर्तवै। आजौ। शयानम्। इन्द्र। चरता। वधेन। वव्रिऽवांसम्। परि। देवीः। अदेवम्॥

Ashtak » 3 Adhyay » 2 Varga » 10 Mantra » 1

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1 Bhashyas
Meaning
हे (इन्द्र) शत्रुओं के नाशक ! (यत्) जो (त्वम्) आपने जैसे (अत्यानिव) घोड़ों को सूर्य के समान (अदेवम्) विद्या प्रकाश से रहित अविद्वान् वा (वृत्रम्) दुष्ट को (जघन्वान्) नाश किया वा सूर्य (चरता) प्राप्त (वधेन) नाश से (शयानम्) सोते हुए से वर्त्तमान (वव्रिवांसम्) ढपे हुए को (देवीः) उत्तम किरणों और (अपः) जलों को (ह) निश्चय से उत्पन्न करता है उसी प्रकार से (सर्त्तवै) जानने योग्य (आजौ) युद्ध में (परि) चारों ओर से (प्र, असृजः) उत्पन्न करते हो, वे आप हम लोगों से सत्कार पाने योग्य हैं ॥६॥
Essence
इस मन्त्र में उपमा और वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो राजा आदि वीर पुरुष जैसे सूर्य मेघ को वैसे संग्राम में चलाये शस्त्र और अस्त्रों से शत्रुओं को जीतते हैं, वे ही प्रतापयुक्त होते हैं ॥६॥
Subject
फिर राजपुरुष क्या करें, इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं।