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Rigveda Mandal 3 / Sukta 32 / Mantra 5

62 Sukta
17 Mantra
3/32/5
Devata- इन्द्र: Rishi- गोपवन आत्रेयः सप्तवध्रिर्वा Chhanda- निचृत्पङ्क्ति Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
म॒नु॒ष्वदि॑न्द्र॒ सव॑नं जुषा॒णः पिबा॒ सोमं॒ शश्व॑ते वी॒र्या॑य। स आ व॑वृत्स्व हर्यश्व य॒ज्ञैः स॑र॒ण्युभि॑र॒पो अर्णा॑ सिसर्षि॥

म॒नु॒ष्वत् । इ॒न्द्र॒ । सव॑नम् । जु॒षा॒णः । पिब॑ । सोम॑म् । शश्व॑ते । वी॒र्या॑य । सः । आ । व॒वृ॒त्स्व॒ । ह॒रि॒ऽअ॒श्व॒ । य॒ज्ञैः । स॒र॒ण्युऽभिः॑ । अ॒पः । अर्णा॑ । सि॒स॒र्षि॒ ॥

Mantra without Swara
मनुष्वदिन्द्र सवनं जुषाणः पिबा सोमं शश्वते वीर्याय। स आ ववृत्स्व हर्यश्व यज्ञैः सरण्युभिरपो अर्णा सिसर्षि॥

मनुष्वत्। इन्द्र। सवनम्। जुषाणः। पिब। सोमम्। शश्वते। वीर्याय। सः। आ। ववृत्स्व। हरिऽअश्व। यज्ञैः। सरण्युऽभिः। अपः। अर्णा। सिसर्षि॥

Ashtak » 3 Adhyay » 2 Varga » 9 Mantra » 5

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1 Bhashyas
Meaning
(हर्य्यश्व) हरणकर्त्ता वा हरे रंग और व्यापन स्वभाववाले घोड़ों के समान अग्नि पदार्थ जिन्होंने जाने वह हे (इन्द्र) अत्यन्त ऐश्वर्य्य के दाता ! जिससे आप (सरण्युभिः) अपने शरण प्राप्त होने की इच्छायुक्त पुरुषों और (यज्ञैः) विद्वानों का सत्कार शिल्पक्रिया और विद्या आदि के दानरूप व्यवहारों से (अर्णा) जलों को (अपः) अन्तरिक्ष के प्रति (सिसर्षि) पहुँचाते हैं इससे (सः) वह आप (सवनम्) ऐश्वर्य्य के (जुषाणः) सेवनेवाले (शश्वते) निरन्तर अनादि सिद्ध (वीर्य्याय) बल के लिये (सोमम्) शरीर और आत्मा के बल तथा विज्ञान के बढ़ानेवाले महौषधि आदि के रस को (पिब) पीवो और (मनुष्वत्) विचार करनेवाले विद्वान् पुरुष के तुल्य ऐश्वर्य्य का सेवनेवाले शरीर और आत्मा के बल और विज्ञान के बढ़ानेवाले महौषधि आदि के रस को पीजिये तथा (आ) (ववृत्स्व) अच्छे प्रकार वर्त्ताव कीजिये ॥५॥
Essence
जो मनुष्य ब्रह्मचर्य विद्या उत्तम शिक्षायुक्त भोजन विहार सत्पुरुषों का सङ्ग और धर्म के सेवन करने से उत्तम आत्मा और परमात्मा के योग से उत्पन्न हुए बल को बढ़ाते हैं, वे लोग सब प्रकार उन्नत होते हैं। जैसे सूर्य्य जल को अन्तरिक्ष के प्रति वायु के साथ ऊपर ले जाता है, वैसे ही विद्वान् लोग सम्पूर्ण जनों को प्रतिष्ठा के साथ उन्नति पर पहुँचाते हैं ॥५॥
Subject
फिर विद्वान् जन क्या करें, इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं।