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Rigveda Mandal 3 / Sukta 32 / Mantra 4

62 Sukta
17 Mantra
3/32/4
Devata- इन्द्र: Rishi- गोपवन आत्रेयः सप्तवध्रिर्वा Chhanda- भुरिक्पङ्क्ति Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
त इन्न्व॑स्य॒ मधु॑मद्विविप्र॒ इन्द्र॑स्य॒ शर्धो॑ म॒रुतो॒ य आस॑न्। येभि॑र्वृ॒त्रस्ये॑षि॒तो वि॒वेदा॑म॒र्मणो॒ मन्य॑मानस्य॒ मर्म॑॥

ते । इत् । नु । अ॒स्य॒ । मधु॑ऽमत् । वि॒वि॒प्रे॒ । इन्द्र॑स्य । शर्धः॑ । म॒रुतः॑ । ये । आस॑न् । येभिः॑ । वृ॒त्रस्य॑ । इ॒षि॒तः । वि॒वेद॑ । अ॒म॒र्मणः॑ । मन्य॑मानस्य । मर्म॑ ॥

Mantra without Swara
त इन्न्वस्य मधुमद्विविप्र इन्द्रस्य शर्धो मरुतो य आसन्। येभिर्वृत्रस्येषितो विवेदामर्मणो मन्यमानस्य मर्म॥

ते। इत्। नु। अस्य। मधुऽमत्। विविप्रे। इन्द्रस्य। शर्धः। मरुतः। ये। आसन्। येभिः। वृत्रस्य। इषितः। विवेद। अमर्मणः। मन्यमानस्य। मर्म॥

Ashtak » 3 Adhyay » 2 Varga » 9 Mantra » 4

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Meaning
(ये) जो (मरुतः) पवनों के सदृश वेग और बल से युक्त पुरुष (अस्य) इस वर्त्तमान (इन्द्रस्य) अत्यन्त ऐश्वर्य्य से युक्त पुरुष के (शर्धः) बल को (विविप्रे) फेंकते हैं (आसन्) मुख में (मधुमत्) बहुत मधुर आदि गुणों से युक्त वस्तुओं से पूर्ण पदार्थ को (इत्) ही रखते हैं जो (येभिः) जिन्हों से (इषितः) प्रेरित हुआ (वृत्रस्य) मेघ के सदृश शत्रु वा (अमर्मणः) मर्म से रहित (मर्म) प्रहार करने से नाश होनवाले स्थान को (मन्यमानस्य) जाननेवाले को (विवेद) जानें (ते) वे पूर्व कहे हुए और वह पुरुष (नु) निश्चय अपने वाञ्छित फल को प्राप्त होते हैं ॥४॥
Essence
जो लोग धन आदि ऐश्वर्य्य से सबके सुख की वृद्धि और दुःखों का निवारण करके सबलोगों को प्रसन्न करते हैं, उनको ही धार्मिक विद्वान् मानना चाहिये ॥४॥
Subject
फिर कौन लोग विद्वान् होते हैं, इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं।

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