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Rigveda Mandal 3 / Sukta 32 / Mantra 2

62 Sukta
17 Mantra
3/32/2
Devata- इन्द्र: Rishi- गोपवन आत्रेयः सप्तवध्रिर्वा Chhanda- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
गवा॑शिरं म॒न्थिन॑मिन्द्र शु॒क्रं पिबा॒ सोमं॑ ररि॒मा ते॒ मदा॑य। ब्र॒ह्म॒कृता॒ मारु॑तेना ग॒णेन॑ स॒जोषा॑ रु॒द्रैस्तृ॒पदा वृ॑षस्व॥

गोऽआ॑शिरम् । म॒न्थिन॑म् । इ॒न्द्र॒ । शु॒क्रम् । पिब॑ । सोम॑म् । र॒रि॒म । ते॒ । मदा॑य । ब्र॒ह्म॒ऽकृता॑ । मारु॑तेन । ग॒णेन॑ । स॒ऽजोषाः॑ । रु॒द्रैः । तृ॒पत् । आ । वृ॒ष॒स्व॒ ॥

Mantra without Swara
गवाशिरं मन्थिनमिन्द्र शुक्रं पिबा सोमं ररिमा ते मदाय। ब्रह्मकृता मारुतेना गणेन सजोषा रुद्रैस्तृपदा वृषस्व॥

गोऽआशिरम्। मन्थिनम्। इन्द्र। शुक्रम्। पिब। सोमम्। ररिम। ते। मदाय। ब्रह्मऽकृता। मारुतेन। गणेन। सऽजोषाः। रुद्रैः। तृपत्। आ। वृषस्व॥

Ashtak » 3 Adhyay » 2 Varga » 9 Mantra » 2

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1 Bhashyas
Meaning
हे (इन्द्र) दुःख के नाश करनेवाले ! हम लोग (ते) आपके (मदाय) आनन्द के अर्थ जिस (गवाशिरम्) किरणों वा इन्द्रियों से मिले हुए (शुक्रम्) शीघ्र सुख पवित्र करने वा (मन्थिनम्) मथने का स्वभाव रखने और (सोमम्) ऐश्वर्य्य के करनेवाले पान करने योग्य वस्तु को (ररिम) देवैं उसका आप (पिब) पान करिये और (ब्रह्मकृता) धन वा अन्न को करनेवाले (मारुतेन) सुवर्ण आदि के सम्बन्धी (गणेन) गणना करने योग्य गिने हुए समूह से (रुद्रैः) प्राणों के सदृश मध्यम विद्वानों के साथ (सजोषाः) अपने तुल्य प्रीति का सेवन करनेवाले (तृपत्) तृप्त होते हुए (आ) सब प्रकार (वृषस्व) वृषभ के तुल्य बलिष्ठ हूजिये ॥२॥
Essence
जो मनुष्य अन्य जनों में अपने तुल्य वर्त्तमान होकर उन लोगों के साथ सुख का ग्रहण और सुवर्ण आदि धन की वृद्धि करके तृप्त हुए बलिष्ठ होते, वे ही श्रीमान् होते हैं ॥२॥
Subject
कौन लोग श्रीमान् होते हैं, इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं।