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Rigveda Mandal 3 / Sukta 32 / Mantra 15

62 Sukta
17 Mantra
3/32/15
Devata- इन्द्र: Rishi- गोपवन आत्रेयः सप्तवध्रिर्वा Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
आपू॑र्णो अस्य क॒लशः॒ स्वाहा॒ सेक्ते॑व॒ कोशं॑ सिसिचे॒ पिब॑ध्यै। समु॑ प्रि॒या आव॑वृत्र॒न्मदा॑य प्रदक्षि॒णिद॒भि सोमा॑स॒ इन्द्र॑म्॥

आपू॑र्णः । अ॒स्य॒ । क॒लशः॑ । स्वाहा॑ । सेक्ता॑ऽइव । कोश॑म् । सि॒सि॒चे॒ । पिब॑ध्यै । सम् । ऊँ॒ इति॑ । प्रि॒याः । आ । अ॒व॒वृ॒त्र॒म् । मदा॑य । प्र॒ऽद॒क्षि॒णित् । अ॒भि । सोमा॑सः । इन्द्र॑म् ॥

Mantra without Swara
आपूर्णो अस्य कलशः स्वाहा सेक्तेव कोशं सिसिचे पिबध्यै। समु प्रिया आववृत्रन्मदाय प्रदक्षिणिदभि सोमास इन्द्रम्॥

आपूर्णः। अस्य। कलशः। स्वाहा। सेक्ताऽइव। कोशम्। सिसिचे। पिबध्यै। सम्। ऊँ इति। प्रियाः। आ। अववृत्रन्। मदाय। प्रऽदक्षिणित्। अभि। सोमासः। इन्द्रम्॥

Ashtak » 3 Adhyay » 2 Varga » 11 Mantra » 5

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1 Bhashyas
Meaning
जो (सोमासः) ऐश्वर्य्य से युक्त (प्रियाः) कामना करने योग्य (मदाय) आनन्द के लिये (इन्द्रम्) सूर्य्य को (अभि) सन्मुख (आ) चारों ओर से (अववृत्रन्) घेरते हैं वे (उ) (अस्य) इस संसार के मध्य में (पिबध्यै) पान करने के लिये (सेक्तेव) पूर्ण करनेवाले के तुल्य (कोशम्) मेघ को (सम्) (सिसिचे) सींचते हैं (स्वाहा) सत्य क्रिया से (आपूर्णः) चारों ओर से भरा हुआ (कलशः) घड़ा (प्रदक्षिणित्) दाहिनी ओर चलनेवाले पूर्ण घड़े के तुल्य सुखकारक होता है ॥१५॥
Essence
जो लोग धन आदि को प्राप्त हो के औरों के लिये सुपात्र और उत्तम व्यवहार करनेवाले को जानके देते हैं, वे लोग सींचनेवाला घड़े को जैसे वैसे सम्पूर्ण जनों को पूर्ण सुखयुक्त करते हैं ॥१५॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं।