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Rigveda Mandal 3 / Sukta 32 / Mantra 14

62 Sukta
17 Mantra
3/32/14
Devata- इन्द्र: Rishi- गोपवन आत्रेयः सप्तवध्रिर्वा Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
वि॒वेष॒ यन्मा॑ धि॒षणा॑ ज॒जान॒ स्तवै॑ पु॒रा पार्या॒दिन्द्र॒मह्नः॑। अंह॑सो॒ यत्र॑ पी॒पर॒द्यथा॑ नो ना॒वेव॒ यान्त॑मु॒भये॑ हवन्ते॥

वि॒वेष॑ । यत् । मा॒ । धि॒षणा॑ । ज॒जान॑ । स्तवै॑ । पु॒रा । पार्या॑त् । इन्द्र॑म् । अह्नः॑ । अंह॑सः । यत्र॑ । पी॒पर॑त् । यथा॑ । नः॒ । ना॒वाऽइ॑व । यान्त॑म् । उ॒भये॑ । ह॒व॒न्ते॒ ॥

Mantra without Swara
विवेष यन्मा धिषणा जजान स्तवै पुरा पार्यादिन्द्रमह्नः। अंहसो यत्र पीपरद्यथा नो नावेव यान्तमुभये हवन्ते॥

विवेष। यत्। मा। धिषणा। जजान। स्तवै। पुरा। पार्यात्। इन्द्रम्। अह्नः। अंहसः। यत्र। पीपरत्। यथा। नः। नावाऽइव। यान्तम्। उभये। हवन्ते॥

Ashtak » 3 Adhyay » 2 Varga » 11 Mantra » 4

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1 Bhashyas
Meaning
हे मनुष्यो ! (यत्) जो (धिषणा) वाणी (मा) मुझको (विवेष) व्याप्त होती और (जजान) उत्पन्न करती है उसकी मैं (स्तवै) प्रशंसा करूँ जो (अह्नः) दिन से (इन्द्रम्) ऐश्वर्य को (पुरा) प्रथम (पार्य्यात्) पार पहुँचावे वा (यत्र) जिस व्यवहार में (अंहसः) अपराध से मुझको (पीपरत्) पार लगावे वा (यथा) जिस प्रकार से (नः) हम लोगों के अर्थ (यान्तम्) जाते हुए को (उभये) दूर और समीप में वर्त्तमान लोग (नावेव) नौका के सदृश (हवन्ते) पुकारते हैं, वैसे हम लोगों को सब लोग पुकारें ॥१४॥
Essence
इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। मनुष्यों को चाहिये कि उस वाणी और बुद्धि को ग्रहण करें, जो सब समय में दुष्ट आचरण से पृथक् रखके दुःख से नौका के सदृश पार उतारे ॥१४॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं।